चित्रकारी
भारतीय चित्रकला की सबसे शुरूआती कृतियाँ पूर्व ऐतिहासिक (pre-historic) काल में रॉक पेंटिंग के रूप में थी। भिम्बेद्का जैसी जगहों पाये गए पेट्रोग्लिफ (petroglyph) - जिनमें से कुछ प्रस्तर युग में बने थे - इसका उदारहण है प्राचीन ग्रंथों में दर्राघ के सिद्धांत और उपाख्यानों के ज़रिये ये बताया गया है कि दरवाजों और घर के भीतरी कमरों, जहाँ मेहमान ठहराए जाते थे, उन्हें पेंट करना एक आम बात थी।
अजंता, बाघ (Bagh) एलोरा और सित्तनवासल (Sittanavasal) के गुफा चित्र और मंदिरों में बने चित्र प्रकृति से प्रेम को प्रमाणित करते हैं। सबसे पहली और मध्यकालीन कला, हिन्दू, बौद्ध या जैन है। रंगे हुए आटे से बनी एक ताजा डिजाइन (रंगोली) आज भी कई भारतीय घरों (मुख्यातक दक्षिण भारतीय घरों) के दरवाज़े पर आम तौर पर बनी हुई देखी जा सकती है।
मधुबनी चित्रकला (Madhubani painting), मैसूर चित्रकला (Mysore painting), राजपूत चित्रकला (Rajput painting), तंजौर चित्रकला (Tanjore painting) और मुगल चित्रकला (Mughal painting), भारतीय कला की कुछ उल्लेखनीय विधाएं हैं, जबकि राजा रवि वर्मा, नंदलाल बोस, गीता वढेरा (Geeta Vadhera), जामिनी रॉय (Jamini Roy) और बी वेंकटप्पा कुछ आधुनिक चित्रकार हैं। वर्तमान समय के कलाकारों में अतुल डोडिया, बोस कृष्णमक्नाहरी, देवज्योति राय और शिबू नटेसन, भारतीय कला के उस नए युग के प्रतिनिधि हैं जिसमें वैश्विक कला का भारतीय शास्त्रीय शैली के साथ मिलाप होता है। हाल के इन कलाकारों ने अंतर्राष्ट्रीय सम्मान अर्जित किया है। देवज्योति राय के चित्र क्यूबा के राष्ट्रिय कला संग्रहालय में रखे गए है और इसी तरह नई पीढी के कुछ अन्य कलाकारों की कृतियाँ और शोध भी नोटिस किए गए है, इनमें सुमिता अलंग जैसे ख्यात कलाकार भी हैं
मूर्तिकला
भारत की पहली मूर्तिकला (sculpture) के नमूने सिन्धु घाटी सभ्यता के ज़माने के हैं जहाँ पत्थर और पीतल की आकृतियों की खोज की गयी। बाद में, जब हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म और जैन धर्म का और विकास हुआ, भारत के मंदिरों में एवं पीतल की कुछ बहद जटिल नक्काशी के नमूने बने.कुछ विशालकाय मंदिर जैसे की एलोरा ऐसे भी थे जिन्हें शिलाखंडों से नहीं बल्कि एक विशालकाय चट्टान को काट कर बनाया गया .
उत्तर पश्चिम में संगमरमर (stucco) के चूने, एक प्रकार की शीस्ट (schist), या मिट्टी (clay) से उत्पादित मुर्तिकला में भारतीय और शास्त्रीय हेलेनिस्टिक (Hellenistic) या संभावित रूप से ग्रीक-रोमन (Greco-Roman) प्रभाव का भारी मिश्रण देखने को मिलता है। लगभग इसी के साथ ही मथुरा की गुलाबी बलुए पत्थरों (sandstone) की मूर्तिकला भी विकसित हुई.इस दौरान गुप्त के शासनकाल में (६ वीं से 4 थी शताब्दी तक) मूर्तिकला, श्रेष्ठ निष्पादन और मॉडलिंग की बारीकी में एक बहुत ही उच्च स्तर पर पहुंच गयी थी। ये और इसके साथ ही भारत के अन्य क्षेत्रों में विकसित हुई शास्त्रीय भारतीय कला ने समूचे दक्षिण पूर्वी केंद्र और पूर्व एशिया में हिन्दू और बौद्ध मूर्तिकला के विकास में अपना योगदान दिया.
वास्तुकला
भारतीय वास्तुकला में शामिल है- समय और स्थान के साथ साथ लगातार नए विचारों को अपनाती हुई अभिव्यक्ति का बाहुल्य.इसके परिणामस्वरूप ऐसे वास्तुशिल्प का उत्पादन हुआ जो इतिहास के दौरान निश्चित रूप से एक निरंतरता रखता है। इसके कुछ बेहद शुरूआती उदहारण मिलते हैं शिन्धु घटी सभ्यता (२६००-१९०० ईसा पूर्व) में जिसमें सुनियोजित शहर और घर पाए जाते थे। इन शहरों का खाका तय करने में धर्म और राजा द्वारा संचालन की कोई महत्वपूर्ण भूमिका रही, ऐसा प्रतीत नहीं होता.
मौर्य और गुप्त साम्राज्य और उनके उत्तराधिकारियों के शासनकाल में, कई बौद्ध वास्तुशिल्प परिसर, जैसे की अजंता और एलोरा और स्मारकीय सांचीस्तूप (Stupa) बनाया गया। बाद में, दक्षिण भारत में कई हिन्दू मंदिरों का निर्माण हुआ जैसे कीबेलूर (Belur) का चेन्नाकेसवा मंदिर (Chennakesava Temple), हालेबिदु (Halebidu) का होयसेल्सवर मंदिर (Hoysaleswara Temple) और सोमानाथपूरा (Somanathapura) का केसव मंदिर (Kesava Temple), थंजावुर (Thanjavur) का ब्रिहदीस्वर मंदिर, कोणार्क (Konark) का सूर्य मंदिर (Sun Temple), श्रीरंगम (Srirangam) का श्री रंगनाथस्वामी मंदिर (Sri Ranganathaswamy Temple) और भट्टीप्रोलू (Bhattiprolu) का बुद्ध स्तूप (stupa) (चिन्ना लांजा डिब्बा और विक्रमार्का कोटा डिब्बा) में.अंगकोरवट, बोरोबुदुर और अन्य बौद्ध और हिंदु मंदिर जो की परम्परिक भारतीय धार्मिक भवनों की शैली में बने हैं, इस बात का संकेत देते हैं कि दक्षिण पूर्व एशियाई वास्तुकला पर भारतीय प्रभाव काफी ज्यादा है।
[[श्री स्वामीनारायण मंदिर, वडताल| वडताल (Vadtal), गुजरात में श्री स्वामीनारायण मंदिर]] ]] पश्चिम से इस्लामिक प्रभाव के आगमन के साथ ही, भारतीय वास्तुकला में भी नए धर्म कि परम्पराओं को अपनाना शुरू के गया। इस युग में बनी कुछ इमारतें हैं- फतेहपुर सीकरी, ताज महल, गोल गुम्बद (Gol Gumbaz), कुतुब मीनार दिल्ली का लाल किला आदि, ये इमारतें अक्सर भारत के अपरिवर्तनीय प्रतीक के रूप में उपयोग की जाती हैं। ब्रिटिश साम्राज्य के औपनिवेशिक शासन के दौरान हिंद-अरबी (Indo-Saracenic) और भारतीय शैली के साथ कई अन्य यूरोपीय शैलियों जैसे गोथिक के मिश्रण को विकसित होते हुए देखा गया, .विक्टोरिया मेमोरियल (Victoria Memorial) या विक्टोरिया टर्मिनस (Victoria Terminus) इसके उल्लेखनीय उदाहरण हैं।कमल मंदिर (Lotus Temple) और भारत की कई आधुनिक शहरी इमारतें इनमें उल्लेखनीय हैं।
वास्तुशास्त्र (Vaastu Shastra) की पारंपरिक प्रणाली फेंग शुई (Feng Shui) के भारतीय प्रतिरूप की तरह है, जो कि शहर की योजना, वास्तुकला और अर्गोनोमिक्स (यानि कार्य की जगह को तनाव कम करने के लिए और प्रभावशाली बनाने के लिए प्रयोग होने वाला विज्ञान) को प्रभावित करता है। ये अस्पष्ट है कि इनमें से कौन सी प्रणाली पुरानी है, लेकिन दोनों में कुछ निश्चित समानताएं ज़रूर हैं। तुलनात्मक रूप से देखें तो फेंग शुई (Feng Shui) का प्रयोग पूरे विश्व में ज्यादा होता है। यद्यपि वास्तु संकल्पना के आधार पर फेंग शुई (Feng Shui) के समान है, इन दोनों में घर के अन्दर ऊर्जा के प्रवाह को संतुलित करने की कोशिश कि जाती है, (इसको संस्कृत में प्राण-शक्ति या प्राण (Prana) कहा जाता है और चीनी भाषा और जापानी भाषा में इसे ची (Chi) / की (Ki) कहा जाता है) लेकिन इनके विस्तृत रूप एक दुसरे से काफी अलग हैं, जैसे की वो निश्चित दिशाएं जिनमें विभिन्न वस्तुओं, कमरों, सामानों आदि को रखना चाहिए.
बौद्ध धर्म के प्रसार के कारण भारतीय वास्तुकला ने पूर्वी और दक्षिण एशिया को प्रभावित किया है। भारतीय स्थापत्य कला के कुछ महत्वपूर्ण लक्षण जैसे की मंदिर टीला या स्तूप (stupa), मंदिर शीर्ष या शिखर (sikhara), मंदिर टॉवर या पगोड़ा (pagoda) और मंदिर द्वार या तोरण (torana) एशियाई संस्कृति का प्रसिद्ध प्रतीक बन गये हैं और इनका प्रयोग पूर्व एशिया (East Asia) और दक्षिण पूर्व एशिया में बड़े पैमाने पर किया जाता है। केन्द्रीय शीर्ष को कभीकभी विमानम् (vimanam) भी कहा जाता है। मंदिर का दक्षिणी द्वार गोपुरम अपनी गूढ़ता और ऐश्वर्य के लिए जाना जाता है।
[[श्री स्वामीनारायण मंदिर, वडताल| वडताल (Vadtal), गुजरात में श्री स्वामीनारायण मंदिर]] ]] पश्चिम से इस्लामिक प्रभाव के आगमन के साथ ही, भारतीय वास्तुकला में भी नए धर्म कि परम्पराओं को अपनाना शुरू के गया। इस युग में बनी कुछ इमारतें हैं- फतेहपुर सीकरी, ताज महल, गोल गुम्बद (Gol Gumbaz), कुतुब मीनार दिल्ली का लाल किला आदि, ये इमारतें अक्सर भारत के अपरिवर्तनीय प्रतीक के रूप में उपयोग की जाती हैं। ब्रिटिश साम्राज्य के औपनिवेशिक शासन के दौरान हिंद-अरबी (Indo-Saracenic) और भारतीय शैली के साथ कई अन्य यूरोपीय शैलियों जैसे गोथिक के मिश्रण को विकसित होते हुए देखा गया, .विक्टोरिया मेमोरियल (Victoria Memorial) या विक्टोरिया टर्मिनस (Victoria Terminus) इसके उल्लेखनीय उदाहरण हैं।कमल मंदिर (Lotus Temple) और भारत की कई आधुनिक शहरी इमारतें इनमें उल्लेखनीय हैं।
वास्तुशास्त्र (Vaastu Shastra) की पारंपरिक प्रणाली फेंग शुई (Feng Shui) के भारतीय प्रतिरूप की तरह है, जो कि शहर की योजना, वास्तुकला और अर्गोनोमिक्स (यानि कार्य की जगह को तनाव कम करने के लिए और प्रभावशाली बनाने के लिए प्रयोग होने वाला विज्ञान) को प्रभावित करता है। ये अस्पष्ट है कि इनमें से कौन सी प्रणाली पुरानी है, लेकिन दोनों में कुछ निश्चित समानताएं ज़रूर हैं। तुलनात्मक रूप से देखें तो फेंग शुई (Feng Shui) का प्रयोग पूरे विश्व में ज्यादा होता है। यद्यपि वास्तु संकल्पना के आधार पर फेंग शुई (Feng Shui) के समान है, इन दोनों में घर के अन्दर ऊर्जा के प्रवाह को संतुलित करने की कोशिश कि जाती है, (इसको संस्कृत में प्राण-शक्ति या प्राण (Prana) कहा जाता है और चीनी भाषा और जापानी भाषा में इसे ची (Chi) / की (Ki) कहा जाता है) लेकिन इनके विस्तृत रूप एक दुसरे से काफी अलग हैं, जैसे की वो निश्चित दिशाएं जिनमें विभिन्न वस्तुओं, कमरों, सामानों आदि को रखना चाहिए.
बौद्ध धर्म के प्रसार के कारण भारतीय वास्तुकला ने पूर्वी और दक्षिण एशिया को प्रभावित किया है। भारतीय स्थापत्य कला के कुछ महत्वपूर्ण लक्षण जैसे की मंदिर टीला या स्तूप (stupa), मंदिर शीर्ष या शिखर (sikhara), मंदिर टॉवर या पगोड़ा (pagoda) और मंदिर द्वार या तोरण (torana) एशियाई संस्कृति का प्रसिद्ध प्रतीक बन गये हैं और इनका प्रयोग पूर्व एशिया (East Asia) और दक्षिण पूर्व एशिया में बड़े पैमाने पर किया जाता है। केन्द्रीय शीर्ष को कभीकभी विमानम् (vimanam) भी कहा जाता है। मंदिर का दक्षिणी द्वार गोपुरम अपनी गूढ़ता और ऐश्वर्य के लिए जाना जाता है।
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