Thursday, 2 March 2017

प्राकृतिक चिकित्सा

प्राकृतिक चिकित्सा

प्राकृतिक चिकित्सा (नेचुरोपैथी / naturopathy) एक चिकित्सा-दर्शन है। इसके अन्तर्गत रोगों का उपचार व स्वास्थ्य-लाभ का आधार है - 'रोगाणुओं से लड़ने की शरीर की स्वाभाविक शक्ति'। प्राकृतिक चिकित्सा के अन्तर्गत अनेक पद्धतियां हैं जैसे - जल चिकित्साहोमियोपैथीसूर्य चिकित्साएक्यूपंक्चरएक्यूप्रेशरमृदा चिकित्सा आदि। प्राकृतिक चिकित्सा के प्रचलन में विश्व की कई चिकित्सा पद्धतियों का योगदान है; जैसे भारत का आयुर्वेद तथा यूरोप का 'नेचर क्योर'।
प्राकृतिक चिकित्सा प्रणाली चिकित्सा की एक रचनात्मक विधि है, जिसका लक्ष्य प्रकृति में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध तत्त्वों के उचित इस्तेमाल द्वारा रोग का मूल कारण समाप्त करना है। यह न केवल एक चिकित्सा पद्धति है बल्कि मानव शरीर में उपस्थित आंतरिक महत्त्वपूर्ण शक्तियों या प्राकृतिक तत्त्वों के अनुरूप एक जीवन-शैली है। यह जीवन कला तथा विज्ञान में एक संपूर्ण क्रांति है।
इस प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति में प्राकृतिक भोजन, विशेषकर ताजे फल तथा कच्ची व हलकी पकी सब्जियाँ विभिन्न बीमारियों के इलाज में निर्णायक भूमिका निभाती हैं।
प्राकृतिक चिकित्सा निर्धन व्यक्तियों एवं गरीब देशों के लिये विशेष रूप से वरदान है।

प्राकृतिक चिकित्सा के मूलभूत सिद्धान्तसंपादित करें

प्राकृतिक चिकित्सक निम्नलिखित छः मूलभूत सिद्धान्तों का अनुसरण करते हैं-
  • (१) कोई हानि नहीं करना
  • (२) रोग के कारण का इलाज करना (न कि लक्षण का)
  • (३) स्वस्थ जीवन जीने तथा रोग से बचने की शिक्षा देना (रोगी-शिक्षा का महत्व)
  • (४) व्यक्तिगत इलाज के द्वारा सम्पूर्ण शरीर को रोगमुक्त करना (हर व्यक्ति अलग है)
  • (५) चिकित्सा के बजाय रोग की रोकथाम करने पर विशेष बल देना
  • (६) शरीर की जीवनी शक्ति (रोगों से लड़ने की क्षमता) को मजबूत बनाना (शरीर ही रोगों को दूर करता है, दवा नहीं)

व्यवहार में प्राकृतिक चिकित्सासंपादित करें

प्राकृतिक चिकित्सा न केवल उपचार की पद्धति है, अपितु यह एक जीवन पद्धति है। इसे बहुधा 'औषधिविहीन उपचार पद्धति' कहा जाता है। यह मुख्य रूप से प्रकृति के सामान्य नियमों के पालन पर आधारित है। जहाँ तक मौलिक सिद्धांतो का प्रश्‍न है, इस पद्धति का आयुर्वेद से निकटतम सम्बन्ध है।
प्राकृतिक चिकित्सा के समर्थक खान-पान एवं रहन-सहन की आदतों, शुद्धि कर्म, जल चिकित्सा, ठण्डी पट्टी, मिटटी की पट्टी, विविध प्रकार के स्नान, मालिश्‍ा तथा अनेक नई प्रकार की चिकित्सा विधाओं पर विश्‍ोष बल देते है। प्राकृतिक चिकित्सक पोषण चिकित्सा, भौतिक चिकित्सावानस्पतिक चिकित्साआयुर्वेद आदि पौर्वात्य चिकित्सा, होमियोपैथी, छोटी-मोटी शल्यक्रिया, मनोचिकित्सा आदि को प्राथमिकता देते हैं।
प्राकृतिक चिकित्सा के व्यवहार में आने वाले कुछ कर्म नीचे वर्णित हैं-

मिट्टी चिकित्सासंपादित करें

मिट्टी जिसमें पृथ्वी तत्व की प्रधानता है जो कि शरीर के विकारों विजातीय पदार्थो को निकाल बाहर करती है। यह कीटाणु नाश्‍ाक है जिसे हम एक महानतम औषधि कह सकते है।

मिट्टी की पट्टी का प्रयोगःसंपादित करें

उदर विकार, विबंध, मधुमेह, सिर दर्द, उच्च रक्त चाप ज्वर, चर्मविकार आदि रोगों में किया जाता है। पीड़ित अंगों के अनुसार अलग अलग मिट्टी की पट्टी बनायी जाती है।

वस्ति (एनिमा)संपादित करें

उपचार के पूर्व इसका प्रयोग किया जाता जिससे कोष्ट शुद्धि हो। रोगानुसार शुद्ध जल नीबू जल, तक्त, निम्ब क्वाथ का प्रयोग किया जाता है। वस्ति (enima) वह क्रिया है, जिसमें गुदामार्ग, मूत्रमार्ग, अपत्यमार्ग, व्रण मुख आदि से औषधि युक्त विभिन्न द्रव पदार्थों को शरीर में प्रवेश कराया जाता है।

जल चिकित्सासंपादित करें

इसके अन्तर्गत उष्ण टावल से स्वेदन, कटि स्नान, टब स्नान, फुट बाथ, परिषेक, वाष्प स्नान, कुन्जल, नेति आदि का प्रयोग वात जन्य रोग पक्षाद्घात राधृसी, शोध, उदर रोग, प्रतिश्‍याय, अम्लपित आदि रोगो में किया जाता है।

सूर्य रश्मि चिकित्सासंपादित करें

सूर्य के प्रकाश के सात रंगो के द्वारा चिकित्सा की जाती है। यह चिकित्‍सा शरीर मे उष्‍णता बढ़ाता है। स्‍नायुओं को उत्‍तेजित करना वात रोग, कफ, ज्‍वर, श्‍वास, कास, आमवात पक्षाघात, ह्रदयरोग, उदरमूल, मेढोरोग, वात जन्‍यरोग, शोध चर्मविकार, पित्‍तजन्‍य रोगों में प्रभावी हैं।

उपवाससंपादित करें

सभी पेट के रोग, श्वास, आमवातसन्धिवात, त्वक विकार, मेदो वृद्धि आदि में विश्‍ोष उपयोग होता है।

प्राकृतिक स्वास्थ्य विज्ञान

प्राकृतिक स्वास्थ्य विज्ञान या आर्थोपैथी (Orthopathy) या 'नेचुरल हाइजिन' (NH), प्राकृतिक चिकित्सा से उत्पन्न हुई एक वैकल्पिक चिकित्सा दर्शन है।[कृपया उद्धरण जोड़ें] यह पद्धति शाकाहार, अपक्व भोजन (बिना पकाया भोजन) तथा उपवास पर बल देती है।[कृपया उद्धरण जोड़ें]
आर्थोपैथी आन्दोलन का आरम्भ डॉ इसाक जेनिंग्स (Isaac Jennings) ने १८२२ के आसपास की थी।

योग  
योग भारत और नेपाल में एक आध्यात्मिक प्रकिया को कहते हैं जिसमें शरीर, मन और आत्मा को एक साथ लाने (योग) का काम होता है। यह शब्द, प्रक्रिया और धारणा बौद्ध धर्म,जैन धर्म और हिंदू धर्म में ध्यान प्रक्रिया से सम्बंधित है। योग शब्द भारत से बौद्ध धर्म के साथ चीनजापानतिब्बत, दक्षिण पूर्व एशिया और श्री लंका में भी फैल गया है और इस समय सारे सभ्य जगत्‌ में लोग इससे परिचित हैं।
इतनी प्रसिद्धि के बाद पहली बार ११ दिसंबर २०१४ को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने प्रत्येक बर्ष २१ जून को विश्व योग दिवस के रूप में मान्यता दी है। भगवद्गीता प्रतिष्ठित ग्रंथ माना जाता है। उसमें योग शब्द का कई बार प्रयोग हुआ है, कभी अकेले और कभी सविशेषण, जैसे बुद्धियोग, संन्यासयोग, कर्मयोग। वेदोत्तर काल में भक्तियोग और हठयोग नाम भी प्रचलित हो गए हैं। महात्मा गांधी ने अनासक्ति योग का व्यवहार किया है। पतंजली योगदर्शन में क्रियायोग शब्द देखने में आता है। पाशुपत योग और माहेश्वर योग जैसे शब्दों के भी प्रसंग मिलते है। इन सब स्थलों में योग शब्द के जो अर्थ हैं वह एक दूसरे के विरोधी हैं परंतु इस प्रकार के विभिन्न प्रयोगों को देखने से यह तो स्पष्ट हो जाता है, कि योग की परिभाषा करना कठिन कार्य है। परिभाषा ऐसी होनी चाहिए जो अव्याप्ति और अतिव्याप्ति दोषों से मुक्त हो, योग शब्द के वाच्यार्थ का ऐसा लक्षण बतला सके जो प्रत्येक प्रसंग के लिये उपयुक्त हो और योग के सिवाय किसी अन्य वस्तु के लिये उपयुक्त न हो।

परिचय : परिभाषा एवं प्रकारसंपादित करें

‘योग’ शब्द ‘युज समाधौ’ आत्मनेपदी दिवादिगणीय धातु में ‘घञ्’ प्रत्यय लगाने से निष्पन्न होता है। इस प्रकार ‘योग’ शब्द का अर्थ हुआ- समाधि अर्थात् चित्त वृत्तियों का निरोध। वैसे ‘योग’ शब्द ‘युजिर योग’ तथा ‘युज संयमने’ धातु से भी निष्पन्न होता है किन्तु तब इस स्थिति में योग शब्द का अर्थ क्रमशः योगफल, जोड़ तथा नियमन होगा। आगे योग में हम देखेंगे कि आत्मा और परमात्मा के विषय में भी योग कहा गया है।
गीता में श्रीकृष्ण ने एक स्थल पर कहा है 'योग: कर्मसु कौशलम्‌' योग से कर्मो में कुशलता आती हैं)। स्पष्ट है कि यह वाक्य योग की परिभाषा नहीं है। कुछ विद्वानों का यह मत है कि जीवात्मा और परमात्मा के मिल जाने को योग कहते हैं। इस बात को स्वीकार करने में यह बड़ी आपत्ति खड़ी होती है कि बौद्धमतावलंबी भी, जो परमात्मा की सत्ता को स्वीकार नहीं करते, योग शब्द का व्यवहार करते और योग का समर्थन करते हैं। यही बात सांख्यवादियों के लिए भी कही जा सकती है जो ईश्वर की सत्ता को असिद्ध मानते हैं। पंतजलि ने योगदर्शन में, जो परिभाषा दी है 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः', चित्त की वृत्तियों के निरोध = पूर्णतया रुक जाने का नाम योग है। इस वाक्य के दो अर्थ हो सकते हैं: चित्तवृत्तियों के निरोध की अवस्था का नाम योग है या इस अवस्था को लाने के उपाय को योग कहते हैं।
परंतु इस परिभाषा पर कई विद्वानों को आपत्ति है। उनका कहना है कि चित्तवृत्तियों के प्रवाह का ही नाम चित्त है। पूर्ण निरोध का अर्थ होगा चित्त के अस्तित्व का पूर्ण लोप, चित्ताश्रय समस्त स्मृतियों और संस्कारों का नि:शेष हो जाना। यदि ऐसा हो जाए तो फिर समाधि से उठना संभव नहीं होगा। क्योंकि उस अवस्था के सहारे के लिये कोई भी संस्कार बचा नहीं होगा, प्रारब्ध दग्ध हो गया होगा। निरोध यदि संभव हो तो श्रीकृष्ण के इस वाक्य का क्या अर्थ होगा? योगस्थ: कुरु कर्माणि, योग में स्थित होकर कर्म करो। विरुद्धावस्था में कर्म हो नहीं सकता और उस अवस्था में कोई संस्कार नहीं पड़ सकते, स्मृतियाँ नहीं बन सकतीं, जो समाधि से उठने के बाद कर्म करने में सहायक हों।
संक्षेप में आशय यह है कि योग के शास्त्रीय स्वरूप, उसके दार्शनिक आधार, को सम्यक्‌ रूप से समझना बहुत सरल नहीं है। संसार को मिथ्या माननेवाला अद्वैतवादी भी निदिध्याह्न के नाम से उसका समर्थन करता है। अनीश्वरवादी सांख्य विद्वान भी उसका अनुमोदन करता है। बौद्ध ही नहीं, मुस्लिम सूफ़ी और ईसाई मिस्टिक भी किसी न किसी प्रकार अपने संप्रदाय की मान्यताओं और दार्शनिक सिद्धांतों के साथ उसका सामंजस्य स्थापित कर लेते हैं।
इन विभिन्न दार्शनिक विचारधाराओं में किस प्रकार ऐसा समन्वय हो सकता है कि ऐसा धरातल मिल सके जिसपर योग की भित्ति खड़ी की जा सके, यह बड़ा रोचक प्रश्न है परंतु इसके विवेचन के लिये बहुत समय चाहिए। यहाँ उस प्रक्रिया पर थोड़ा सा विचार कर लेना आवश्यक है जिसकी रूपरेखा हमको पतंजलि के सूत्रों में मिलती है। थोड़े बहुत शब्दभेद से यह प्रक्रिया उन सभी समुदायों को मान्य है जो योग के अभ्यास का समर्थन करते हैं।

परिभाषासंपादित करें

  • (१) पातंजल योग दर्शन के अनुसार - योगश्चित्तवृत्त निरोधः (1/2) अर्थात् चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है।
  • (२) सांख्य दर्शन के अनुसार - पुरुषप्रकृत्योर्वियोगेपि योगइत्यमिधीयते। अर्थात् पुरुष एवं प्रकृति के पार्थक्य को स्थापित कर पुरुष का स्व स्वरूप में अवस्थित होना ही योग है।
  • (३) विष्णुपुराण के अनुसार - योगः संयोग इत्युक्तः जीवात्म परमात्मने। अर्थात् जीवात्मा तथा परमात्मा का पूर्णतया मिलन ही योग है।
  • (४) भगवद्गीता के अनुसार - सिद्दध्यसिद्दध्यो समोभूत्वा समत्वंयोग उच्चते। (2/48) अर्थात् दुःख-सुख, लाभ-अलाभ, शत्रु-मित्र, शीत और उष्ण आदि द्वन्दों में सर्वत्र समभाव रखना योग है।
  • (५) भगवद्गीता के अनुसार - तस्माद्दयोगाययुज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्। अर्थात् कर्त्तव्य कर्म बन्धक न हो, इसलिए निष्काम भावना से अनुप्रेरित होकर कर्त्तव्य करने का कौशल योग है।
  • (६) आचार्य हरिभद्र के अनुसार - मोक्खेण जोयणाओ सव्वो वि धम्म ववहारो जोगो। मोक्ष से जोड़ने वाले सभी व्यवहार योग है।
  • (७) बौद्ध धर्म के अनुसार - कुशल चितैकग्गता योगः। अर्थात् कुशल चित्त की एकाग्रता योग है।

योग के प्रकारसंपादित करें

योग की उच्चावस्था समाधिमोक्षकैवल्य आदि तक पहुँचने के लिए अनेकों साधकों ने जो साधन अपनाये उन्हीं साधनों का वर्णन योग ग्रन्थों में समय समय पर मिलता रहा। उसी को योग के प्रकार से जाना जाने लगा। योग की प्रमाणिक पुस्तकों में शिवसंहिता तथा गोरक्षशतक में योग के चार प्रकारों का वर्णन मिलता है -
मंत्रयोगों हष्ष्चैव लययोगस्तृतीयकः।
चतुर्थो राजयोगः (शिवसंहिता , 5/11)
मंत्रो लयो हठो राजयोगन्तर्भूमिका क्रमात्
एक एव चतुर्धाऽयं महायोगोभियते॥ (गोरक्षशतकम् )
उपर्युक्त दोनों श्लोकों से योग के प्रकार हुए : मंत्रयोग, हठयोग लययोग व राजयोग।

मंत्रयोगसंपादित करें

'मंत्र' का समान्य अर्थ है- 'मननात् त्रायते इति मंत्रः'। मन को त्राय (पार कराने वाला) मंत्र ही है। मंत्र योग का सम्बन्ध मन से है, मन को इस प्रकार परिभाषित किया है- मनन इति मनः। जो मनन, चिन्तन करता है वही मन है। मन की चंचलता का निरोध मंत्र के द्वारा करना मंत्र योग है। मंत्र योग के बारे में योगतत्वोपनिषद में वर्णन इस प्रकार है-
योग सेवन्ते साधकाधमाः।
( अल्पबुद्धि साधक मंत्रयोग से सेवा करता है अर्थात मंत्रयोग अनसाधकों के लिए है जो अल्पबुद्धि है।)
मंत्र से ध्वनि तरंगें पैदा होती है मंत्र शरीर और मन दोनों पर प्रभाव डालता है। मंत्र में साधक जप का प्रयोग करता है मंत्र जप में तीन घटकों का काफी महत्व है वे घटक-उच्चारण, लय व ताल हैं। तीनों का सही अनुपात मंत्र शक्ति को बढ़ा देता है। मंत्रजप मुख्यरूप से चार प्रकार से किया जाता है।
(1) वाचिक (2) मानसिक (3) उपांशु (4) अणपा।

हठयोगसंपादित करें

हठ का शाब्दिक अर्थ हटपूर्वक किसी कार्य करने से लिया जाता है। हठ प्रदीपिका पुस्तक में हठ का अर्थ इस प्रकार दिया है-
हकारेणोच्यते सूर्यष्ठकार चन्द्र उच्यते।
सूर्या चन्द्रमसो र्योगाद्धठयोगोऽभिधीयते॥
 का अर्थ सूर्य तथ  का अर्थ चन्द्र बताया गया है। सूर्य और चन्द्र की समान अवस्था हठयोग है। शरीर में कई हजार नाड़ियाँ है उनमें तीन प्रमुख नाड़ियों का वर्णन है, वे इस प्रकार हैं। सूर्यनाडी अर्थात पिंगला जो दाहिने स्वर का प्रतीक है। चन्द्रनाडी अर्थात इड़ा जो बायें स्वार का प्रतीक है। इन दोनों के बीच तीसरी नाड़ी सुषुम्ना है। इस प्रकार हठयोग वह क्रिया है जिसमें पिंगला और इड़ा नाड़ी के सहारे प्राण को सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेष कराकर ब्रहमरन्ध्र में समाधिस्थ किया जाता है। हठ प्रदीपिका में हठयोग के चार अंगों का वर्णन है- आसन, प्राणायाम, मुद्रा और बन्ध तथा नादानुसधान। घेरण्डसंहिता में सात अंग- षटकर्म, आसन, मुद्राबन्ध, प्राणायाम, ध्यान, समाधि जबकि योगतत्वोपनिषद में आठ अंगों का वर्णन है- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, भ्रमध्येहरिम् और समाधि।

लययोगसंपादित करें

चित्त का अपने स्वरूप विलीन होना या चित्त की निरूद्ध अवस्था लयोग के अन्तर्गत आता है। साधक के चित्त् में जब चलते, बैठते, सोते और भोजन करते समय हर समय ब्रहम का ध्यान रहे इसी को लययोग कहते हैं। योगत्वोपनिषद में इस प्रकार वर्णन है-
गच्छस्तिष्ठन स्वपन भुंजन् ध्यायेन्त्रिष्कलमीश्वरम् स एव लययोगः स्यात (22-23)

राजयोगसंपादित करें

राजयोग सभी योगों का राजा कहलाया जाता है क्योंकि इसमें प्रत्येक प्रकार के योग की कुछ न कुछ समामिग्री अवश्य मिल जाती है। राजयोग महर्षि पतंजलि द्वारा रचित अष्टांग योग का वर्णन आता है। राजयोग का विषय चित्तवृत्तियों का निरोध करना है।
महर्षि पतंजलि के अनुसार समाहित चित्त वालों के लिए अभ्यास और वैराग्य तथा विक्षिप्त चित्त वालों के लिए क्रियायोग का सहारा लेकर आगे बढ़ने का रास्ता सुझाया है। इन साधनों का उपयोग करके साधक के क्लेशों का नाश होता है, चित्तप्रसन्न होकर ज्ञान का प्रकाश फैलता है और विवेकख्याति प्राप्त होती है है।
योगाडांनुष्ठानाद शुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिरा विवेक ख्यातेः (2/28)
राजयोग के अन्तर्गत महिर्ष पतंजलि ने अष्टांग को इस प्रकार बताया है-
यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टाङ्गानि।
योग के आठ अंगों में प्रथम पाँच बहिरंग तथा अन्य तीन अन्तरंग में आते हैं।
उपर्युक्त चार पकार के अतिरिक्त गीता में दो प्रकार के योगों का वर्णन मिलता है-
ज्ञानयोग, सांख्ययोग से सम्बन्ध रखता है। पुरुष प्रकृति के बन्धनों से मुक्त होना ही ज्ञान योग है। सांख्य दर्शन में 25 तत्वों का वर्णन मिलता है।

योग का इतिहाससंपादित करें

वैदिक संहिताओं के अंतर्गत तपस्वियों (तपस) के बारे में ((कल | ब्राह्मण)) प्राचीन काल से वेदों में (९०० से ५०० बी सी ई) उल्लेख मिलता है, जब कि तापसिक साधनाओं का समावेश प्राचीन वैदिक टिप्पणियों में प्राप्त है। कई मूर्तियाँ जो सामान्य योग या समाधि मुद्रा को प्रदर्शित करती है, सिंधु घाटी सभ्यता (सी.3300-1700 बी.सी. इ.) के स्थान पर प्राप्त हुईं है। पुरातत्त्वज्ञ ग्रेगरी पोस्सेह्ल के अनुसार," ये मूर्तियाँ योग के धार्मिक संस्कार" के योग से सम्बन्ध को संकेत करती है। यद्यपि इस बात का निर्णयात्मक सबूत नहीं है फिर भी अनेक पंडितों की राय में सिंधु घाटी सभ्यता और योग-ध्यान में सम्बन्ध है।

ध्यान में उच्च चैतन्य को प्राप्त करने कि रीतियों का विकास श्र्मानिक परम्पराओं द्वारा एवं उपनिषद् की परंपरा द्वारा विकसित हुआ था।
बुद्ध के पूर्व एवं प्राचीन ब्रह्मिनिक ग्रंथों मे ध्यान के बारे मे कोई ठोस सबूत नहीं मिलता है, बुद्ध के दो शिक्षकों के ध्यान के लक्ष्यों के प्रति कहे वाक्यों के आधार पर वय्न्न यह तर्क करते है की निर्गुण ध्यान की पद्धति ब्रह्मिन परंपरा से निकली इसलिए उपनिषद् की सृष्टि के प्रति कहे कथनों में एवं ध्यान के लक्ष्यों के लिए कहे कथनों में समानता है। यह संभावित हो भी सकता है, नहीं भी.
उपनिषदों में ब्रह्माण्ड संबंधी बयानॉ के वैश्विक कथनों में किसी ध्यान की रीति की सम्भावना के प्रति तर्क देते हुए कहते है की नासदीय सूक्त किसी ध्यान की पद्धति की ओर ऋग वेद से पूर्व भी इशारा करते है।
यह बौद्ध ग्रंथ शायद सबसे प्राचीन ग्रंथ है जिन में ध्यान तकनीकों का वर्णन प्राप्त होता है। वे ध्यान की प्रथाओं और अवस्थाओं का वर्णन करते है जो बुद्ध से पहले अस्तित्व में थीं और साथ ही उन प्रथाओं का वर्णन करते है जो पहले बौद्ध धर्म के भीतर विकसित हुईं. हिंदु वांग्मय में,"योग" शब्द पहले कथा उपानिषद में प्रस्तुत हुआ जहाँ ज्ञानेन्द्रियों का नियंत्रण और मानसिक गतिविधि के निवारण के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है जो उच्चतम स्तिथि प्रदान करने वाला मन गया है। महत्वपूर्ण ग्रन्थ जो योग की अवधारणा से सम्बंधित है वे मध्य कालीन उपनिषद्महाभारत,भगवद गीता 200 BCE) एवं पथांजलि के योग सूत्र है। (ca. 400 BCE)

पतंजलि के योग सूत्रसंपादित करें

भारतीय दर्शन में, षड् दर्शनों में से एक का नाम योग है।  योग दार्शनिक प्रणाली,सांख्य स्कूल के साथ निकटता से संबन्धित है। ऋषि पतंजलि द्वारा व्याख्यायित योग संप्रदाय सांख्य मनोविज्ञान और तत्वमीमांसा को स्वीकार करता है, लेकिन सांख्य घराने की तुलना में अधिक आस्तिक है, यह प्रमाण है क्योंकि सांख्य वास्तविकता के पच्चीस तत्वों में ईश्वरीय सत्ता भी जोड़ी गई है। योग और सांख्य एक दुसरे से इतने मिल्झुलते है कि मेक्स म्युल्लर कहते है,"यह दो दर्शन इतने प्रसिद्ध थे कि एक दुसरे का अंतर समझने के लिए एक को प्रभु के साथ और दुसरे को प्रभु के बिना माना जाता है।...." सांख्य और योग के बीच घनिष्ठ संबंध हेंरीच ज़िम्मेर समझाते है:
इन दोनों को भारत में जुड़वा के रूप में माना जाता है, जो एक ही विषय के दो पहलू है।Sāṅkhya[41]यहाँ मानव प्रकृति की बुनियादी सैद्धांतिक का प्रदर्शन, विस्तृत विवरण और उसके तत्वों का परिभाषित, बंधन (बंधा) के स्थिति में उनके सहयोग करने के तरीके, सुलझावट के समय अपने स्थिति का विश्लेषण या मुक्ति मे वियोजन ({{2}{IAST|मोक्ष}}) का व्याख्या किया गया है। योग विशेष रूप से प्रक्रिया की गतिशीलता के सुलझाव के लिए उपचार करता है और मुक्ति प्राप्त करने की व्यावहारिक तकनीकों को सिद्धांत करता है अथवा 'अलगाव-एकीकरण'(कैवल्य) का उपचार करता है।
पतंजलि, व्यापक रूप से औपचारिक योग दर्शन के संस्थापक मने जाते है। पतंजलि के योग, बुद्धि का नियंत्रण के लिए एक प्रणाली है,राज योग के रूप में जाना जाता है।  पतांजलि उनके दूसरे सूत्र मे "योग" शब्द का परिभाषित करते है, जो उनके पूरे काम के लिए व्याख्या सूत्र माना जाता है:
योग: चित्त-वृत्ति निरोध:
- योग सूत्र 1.2
तीन संस्कृत शब्दों के अर्थ पर यह संस्कृत परिभाषा टिका है। अई.के.तैम्नी इसकी अनुवाद करते है की,"योग बुद्धि के संशोधनों (vṛtti [49]) का निषेध (nirodhaḥ [48]) है" (citta [50])।  योग का प्रारंभिक परिभाषा मे इस शब्द nirodhaḥ [52] का उपयोग एक उदाहरण है कि बौधिक तकनीकी शब्दावली और अवधारणाओं, योग सूत्र मे एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है; इससे यह संकेत होता है कि बौद्ध विचारों के बारे में पतांजलि को जानकारी थी और अपने प्रणाली मे उन्हें बुनाई.स्वामी विवेकानंद इस सूत्र को अनुवाद करते हुए कहते है,"योग बुद्धि (चित्त) को विभिन्न रूपों (वृत्ति) लेने से अवरुद्ध करता है।

इस, दिल्ली के बिरला मंदिर में एक हिंदू योगी का मूर्ती
पतांजलि का लेखन 'अष्टांग योग"("आठ-अंगित योग") एक प्रणाली के लिए आधार बन गया।
29th सूत्र के दूसरी किताब से यह आठ-अंगित अवधारण को प्राप्त किया गया था और व्यावहारिक रूप मे भिन्नरूप से सिखाये गए प्रत्येक राजा योग का एक मुख्य विशेषता है।
आठ अंग हैं:
  1. यम (पांच "परिहार"): अहिंसा, झूठ नहीं बोलना, गैर लोभ, गैर विषयासक्ति और गैर स्वामिगत.
  2. नियम (पांच "धार्मिक क्रिया"): पवित्रता, संतुष्टि, तपस्या, अध्ययन और भगवान को आत्मसमर्पण.
  3. आसन:मूलार्थक अर्थ "बैठने का आसन" और पतांजलि सूत्र में ध्यान
  4. प्राणायाम ("सांस को स्थगित रखना"): प्राणा, सांस, "अयामा ", को नियंत्रित करना या बंद करना। साथ ही जीवन शक्ति को नियंत्रण करने की व्याख्या की गयी है।
  5. प्रत्यहार ("अमूर्त"):बाहरी वस्तुओं से भावना अंगों के प्रत्याहार.
  6. धारणा ("एकाग्रता"): एक ही लक्ष्य पर ध्यान लगाना.
  7. ध्यान ("ध्यान"):ध्यान की वस्तु की प्रकृति गहन चिंतन.
  8. समाधि("विमुक्ति"):ध्यान के वस्तु को चैतन्य के साथ विलय करना। इसके दो प्रकार है - सविकल्प और अविकल्प। अविकल्प समाधि में संसार में वापस आने का कोई मार्ग या व्यवस्था नहीं होती। यह योग पद्धति की चरम अवस्था है।
इस संप्रदाय के विचार मे, उच्चतम प्राप्ति विश्व के अनुभवी विविधता को भ्रम के रूप मे प्रकट नहीं करता. यह दुनिया वास्तव है। इसके अलावा, उच्चतम प्राप्ति ऐसा घटना है जहाँ अनेक में से एक व्यक्तित्व स्वयं, आत्म को आविष्कार करता है, कोई एक सार्वभौमिक आत्म नहीं है जो सभी व्यक्तियों द्वारा साझा जाता है।

भगवद गीतासंपादित करें

भगवद गीता (प्रभु के गीत), बड़े पैमाने पर विभिन्न तरीकों से योग शब्द का उपयोग करता है। एक पूरा अध्याय (छठा अध्याय) सहित पारंपरिक योग का अभ्यास को समर्पित, ध्यान के सहित, करने के अलावा इस मे योग के तीन प्रमुख प्रकार का परिचय किया जाता है।
  • कर्म योग: कार्रवाई का योग। इसमें व्यक्ति अपने स्थिति के उचित और कर्तव्यों के अनुसार कर्मों का श्रद्धापूर्वक निर्वाह करता है।
  • भक्ति योग: भक्ति का योग। भगवत कीर्तन। इसे भावनात्मक आचरण वाले लोगों को सुझाया जाता है।
  • ज्ञाना योग: ज्ञान का योग - ज्ञानार्जन करना।
मधुसूदना सरस्वती (जन्म 1490) ने गीता को तीन वर्गों में विभाजित किया है, जहाँ प्रथम छह अध्यायों मे कर्म योग के बारे मे, बीच के छह मे भक्ति योग और पिछले छह अध्यायों मे ज्ञाना (ज्ञान) योग के बारे मे गया है। अन्य टिप्पणीकारों प्रत्येक अध्याय को एक अलग 'योग' से संबंध बताते है, जहाँ अठारह अलग योग का वर्णन किया है।

हठयोगसंपादित करें

हठयोग योग, योग की एक विशेष प्रणाली है जिसे 15वीं सदी के भारत में हठ योग प्रदीपिका के संकलक, योगी स्वत्मरमा द्वारा वर्णित किया गया था।
हठयोग पतांजलि के राज योग से काफी अलग है जो सत्कर्म पर केन्द्रित है, भौतिक शरीर की शुद्धि ही मन की, प्राण की और विशिष्ट ऊर्जा की शुद्धि लती है।[62] [63] केवल पतांजलि राज योग के ध्यान आसन के बदले, [64] यह पूरे शरीर के लोकप्रिय आसनों की चर्चा करता है। हठयोग अपनी कई आधुनिक भिन्नरूपों में एक शैली है जिसे बहुत से लोग "योग" शब्द के साथ जोड़ते है।

अन्य परंपराओं में योग प्रथासंपादित करें

बौद्ध-धर्मसंपादित करें


बुद्ध पद्मासन मुद्रा में योग ध्यान में.
प्राचीन बौद्धिक धर्म ने ध्यानापरणीय अवशोषण अवस्था को निगमित किया। बुद्ध के प्रारंभिक उपदेशों में योग विचारों का सबसे प्राचीन निरंतर अभिव्यक्ति पाया जाता है। बुद्ध के एक प्रमुख नवीन शिक्षण यह था की ध्यानापरणीय अवशोषण को परिपूर्ण अभ्यास से संयुक्त करे. बुद्ध के उपदेश और प्राचीन ब्रह्मनिक ग्रंथों में प्रस्तुत अंतर विचित्र है।
बुद्ध के अनुसार, ध्यानापरणीय अवस्था एकमात्र अंत नहीं है, उच्चतम ध्यानापरणीय स्थिती में भी मोक्ष प्राप्त नहीं होता।

अपने विचार के पूर्ण विराम प्राप्त करने के बजाय, किसी प्रकार का मानसिक सक्रियता होना चाहिए:एक मुक्ति अनुभूति, ध्यान जागरूकता के अभ्यास पर आधारित होना चाहिए।  बुद्ध ने मौत से मुक्ति पाने की प्राचीन ब्रह्मनिक अभिप्राय को ठुकराया. ब्रह्मिनिक योगिन को एक गैरद्विसंक्य द्रष्टृगत स्थिति जहाँ मृत्यु मे अनुभूति प्राप्त होता है, उस स्थिति को वे मुक्ति मानते है।
बुद्ध ने योग के निपुण की मौत पर मुक्ति पाने की पुराने ब्रह्मिनिक अन्योक्त ("उत्तेजनाहीन होना, क्षणस्थायी होना") को एक नया अर्थ दिया; उन्हें, ऋषि जो जीवन में मुक्त है के नाम से उल्लेख किया गया था।
इन्हें भी देखें: प्राणायाम

योगकारा बौद्धिक धर्मसंपादित करें

योगकारा(संस्कृत:"योग का अभ्यास" शब्द विन्यास योगाचारा, दर्शन और मनोविज्ञान का एक संप्रदाय है, जो भारत में 4 वीं से 5 वीं शताब्दी मे विकसित किया गया था।
योगकारा को यह नाम प्राप्त हुआ क्योंकि उसने एक योग प्रदान किया, एक रूपरेखा जिससे बोधिसत्त्व तक पहुँचने का एक मार्ग दिखाया है। ज्ञान तक पहुँचने के लिए यह योगकारा संप्रदाय योग सिखाता है।

छ'अन (सिओन/ ज़ेन) बौद्ध धर्मसंपादित करें

ज़ेन (जिसका नाम संस्कृत शब्द "ध्याना से" उत्पन्न किया गया चीनी "छ'अन" के माध्यम से  महायान बौद्ध धर्म का एक रूप है। बौद्ध धर्म की महायान संप्रदाय योग के साथ अपनी निकटता के कारण विख्यात किया जाता है। पश्चिम में, जेन को अक्सर योग के साथ व्यवस्थित किया जाता है;ध्यान प्रदर्शन के दो संप्रदायों स्पष्ट परिवारिक उपमान प्रदर्शन करते है। यह घटना को विशेष ध्यान योग्य है क्योंकि कुछ योग प्रथाओं पर ध्यान की ज़ेन बौद्धिक स्कूल आधारित है।[81]योग की कुछ आवश्यक तत्वों सामान्य रूप से बौद्ध धर्म और विशेष रूप से ज़ेन धर्म को महत्वपूर्ण हैं।

भारत और तिब्बत के बौद्धिक धर्मसंपादित करें

योग तिब्बती बौद्ध धर्म का केंद्र है। न्यिन्गमा परंपरा में, ध्यान का अभ्यास का रास्ता नौ यानों, या वाहन मे विभाजित है, कहा जाता है यह परम व्यूत्पन्न भी है। अंतिम के छह को "योग यानास" के रूप मे वर्णित किया जाता है, यह है:क्रिया योगउप योग (चर्या)योगा यानामहा योगअनु योग और अंतिम अभ्यास अति योग. सरमा परंपराओं नेमहायोग और अतियोग की अनुत्तारा वर्ग से स्थानापन्न करते हुए क्रिया योग, उपा (चर्या) और योग को शामिल किया हैं। अन्य तंत्र योग प्रथाओं में 108 शारीरिक मुद्राओं के साथ सांस और दिल ताल का अभ्यास शामिल हैं। अन्य तंत्र योग प्रथाओं 108 शारीरिक मुद्राओं के साथ सांस और दिल ताल का अभ्यास को शामिल हैं।

यह न्यिन्गमा परंपरा यंत्र योग का अभ्यास भी करते है। (तिब. तरुल खोर), यह एक अनुशासन है जिसमे सांस कार्य (या प्राणायाम), ध्यानापरणीय मनन और सटीक गतिशील चाल से अनुसरण करनेवाले का ध्यान को एकाग्रित करते है।  लुखंग मे दलाई लामा के सम्मर मंदिर के दीवारों पर तिब्बती प्राचीन योगियों के शरीर मुद्राओं चित्रित किया जाया है।
चांग (1993) द्वारा एक अर्द्ध तिब्बती योगा के लोकप्रिय खाते ने कन्दली (तिब.तुम्मो) अपने शरीर में गर्मी का उत्पादन का उल्लेख करते हुए कहते है कि "यह संपूर्ण तिब्बती योगा की बुनियाद है". चांग यह भी दावा करते है कि तिब्बती योगा प्राना और मन को सुलह करता है, और उसे तंत्रिस्म के सैद्धांतिक निहितार्थ से संबंधित करते है।

जैन धर्मसंपादित करें


तीर्थंकर पार्स्व यौगिक ध्यान में कयोत्सर्गा मुद्रा में.

महावीर के केवल ज्ञान मुलाबंधासना मुद्रा में
दूसरी शताब्दी के सी इ जैन पाठ तत्त्वार्थसूत्र, के अनुसार मन, वाणी और शरीर सभी गतिविधियों का कुल योग है। उमास्वती कहते है कि अस्रावा या कार्मिक प्रवाह का कारण योग है साथ ही- सम्यक चरित्र - मुक्ति के मार्ग मे यह बेहद आवश्यक है।
 अपनी नियामसरा में, आचार्य कुंडाकुण्डने योग भक्ति का वर्णन- भक्ति से मुक्ति का मार्ग - भक्ति के सर्वोच्च रूप के रूप मे किया है। आचार्य हरिभद्र और आचार्य हेमचन्द्र के अनुसार पाँच प्रमुख उल्लेख संन्यासियों और 12 समाजिक लघु प्रतिज्ञाओं योग के अंतर्गत शामिल है। इस विचार के वजह से कही इन्डोलोज़िस्ट्स जैसे प्रो रॉबर्ट जे ज़्यीडेन्बोस ने जैन धर्म के बारे मे यह कहा कि यह अनिवार्य रूप से योग सोच का एक योजना है जो एक पूर्ण धर्म के रूप मे बढ़ी हो गयी।
 डॉ॰ हेंरीच ज़िम्मर संतुष्ट किया कि योग प्रणाली को पूर्व आर्यन का मूल था, जिसने वेदों की सत्ता को स्वीकार नहीं किया और इसलिए जैन धर्म के समान उसे एक विधर्मिक सिद्धांतों के रूप में माना गया था
 जैन शास्त्र, जैन तीर्थंकरों को ध्यान मे पद्मासना या कयोत्सर्गा योग मुद्रा में दर्शाया है। ऐसा कहा गया है कि महावीर को मुलाबंधासना स्थिति में बैठे केवला ज्ञान "आत्मज्ञान" प्राप्त हुआ जो अचरंगा सूत्र मे और बाद में कल्पसूत्र मे पहली साहित्यिक उल्लेख के रूप मे पाया गया है।

पतांजलि योगसूत्र के पांच यामा या बाधाओं और जैन धर्म के पाँच प्रमुख प्रतिज्ञाओं में अलौकिक सादृश्य है, जिससे जैन धर्म का एक मजबूत प्रभाव का संकेत करता है।
 लेखक विवियन वोर्थिंगटन ने यह स्वीकार किया कि योग दर्शन और जैन धर्म के बीच पारस्परिक प्रभाव है और वे लिखते है:"योग पूरी तरह से जैन धर्म को अपना ऋण मानता है और विनिमय मे जैन धर्म ने योग के साधनाओं को अपने जीवन का एक हिस्सा बना लिया".
   सिंधु घाटी मुहरों और इकोनोग्रफी भी एक यथोचित साक्ष्य प्रदान करते है कि योग परंपरा और जैन धर्म के बीच संप्रदायिक सदृश अस्तित्व है।
 विशेष रूप से, विद्वानों और पुरातत्वविदों ने विभिन्न तिर्थन्करों की मुहरों में दर्शाई गई योग और ध्यान मुद्राओं के बीच समानताओं पर टिप्पणी की है: रुषभ की "कयोत्सर्गा"मुद्रा और महावीर के मुलबन्धासन मुहरों के साथ ध्यान मुद्रा में पक्षों में सर्पों की खुदाई पार्श्वनाथ की खुदाई से मिलती जुलती है।
यह सभी न केवल सिंधु घाटी सभ्यता और जैन धर्म के बीच कड़ियों का संकेत कर रहे हैं, बल्कि विभिन्न योग प्रथाओं को जैन धर्म का योगदान प्रदर्शन करते है।
जैन सिद्धांत और साहित्य के सन्दर्भसंपादित करें
प्राचीनतम के जैन धर्मवैधानिक साहित्य जैसे अचरंगासुत्र और नियमासरा, तत्त्वार्थसूत्र आदि जैसे ग्रंथों ने साधारण व्यक्ति और तपस्वीयों के लिए जीवन का एक मार्ग के रूप में योग पर कई सन्दर्भ दिए है।
बाद के ग्रंथ, जिसमे योग के जैन अवधारणा सविस्तार है, वह निम्नानुसार हैं:
  • पुज्यपदा (5 वीं शताब्दी सी इ)
    • इष्टोपदेश
  • आचार्य हरिभद्र सूरी (8 वीं शताब्दी सी इ)
    • योगबिंदु
    • योगद्रिस्तिसमुच्काया
    • योगसताका
    • योगविमिसिका
  • आचार्य जोंदु (8 वीं शताब्दी सी इ)
    • योगसारा
  • आचार्य हेमाकान्द्र (11 वीं सदी सी इ)
    • योगसस्त्र
  • आचार्य अमितागति (11 वीं सदी सी इ)
    • योगसराप्रभ्र्ता

इस्लामसंपादित करें

सूफी संगीत के विकास में भारतीय योग अभ्यास का काफी प्रभाव है, जहाँ वे दोनों शारीरिक मुद्राओं (आसन) और श्वास नियंत्रण (प्राणायाम) को अनुकूलित किया है। 11 वीं शताब्दी के प्राचीन समय में प्राचीन भारतीय योग पाठ, अमृतकुंड, ("अमृत का कुंड") का अरबी और फारसी भाषाओं में अनुवाद किया गया था।
सन 2008 में मलेशिया के शीर्ष इस्लामिक समिति ने कहा जो मुस्लमान योग अभ्यास करते है उनके खिलाफ एक फतवा लगू किया, जो कानूनी तौर पर गैर बाध्यकारी है, कहते है कि योग में "हिंदू आध्यात्मिक उपदेशों" के तत्वों है और इस से ईश-निंदा हो सकती है और इसलिए यह हराम है।
मलेशिया में मुस्लिम योग शिक्षकों ने "अपमान" कहकर इस निर्णय की आलोचना कि. मलेशिया में महिलाओं के समूह, ने भी  अपना निराशा व्यक्त की और उन्होंने कहा कि वे अपनी योग कक्षाओं को जारी रखेंगे. इस फतवा में कहा गया है कि शारीरिक व्यायाम के रूप में योग अभ्यास अनुमेय है, पर धार्मिक मंत्र का गाने पर प्रतिबंध लगा दिया है, और यह भी कहते है कि भगवान के साथ मानव का मिलाप जैसे शिक्षण इस्लामी दर्शन के अनुरूप नहीं है।
इसी तरह,उलेमस की परिषद, इंडोनेशिया में एक इस्लामी समिति ने योग पर प्रतिबंध, एक फतवे द्वारा लागू किया क्योंकि इसमें "हिंदू तत्व" शामिल थे। किन्तु इन फतवों को दारुल उलूम देओबंद ने आलोचना की है, जो देओबंदी इस्लाम का भारत में शिक्षालय है।

सन 2009 मई में, तुर्की के निदेशालय के धार्मिक मामलों के मंत्रालय के प्रधान शासक अली बर्दाकोग्लू ने योग को एक व्यावसायिक उद्यम के रूप में घोषित किया- योग के संबंध में कुछ आलोचनाये जो इसलाम के तत्वों से मेल नहीं खातीं.[68]

ईसाई धर्मसंपादित करें

सन 1989 में, वैटिकन ने घोषित किया कि ज़ेन और योग जैसे पूर्वी ध्यान प्रथाओं "शरीर के एक गुट में बदज़ात" हो सकते है।
वैटिकन के बयान के बावजूद, कई रोमन कैथोलिक उनके आध्यात्मिक प्रथाओं में योग , बौद्ध धर्म और हिंदू धर्म के तत्वों का प्रयोग किया है।

तंत्रसंपादित करें

तंत्र एक प्रथा है जिसमें उनके अनुसरण करनेवालों का संबंध साधारण, धार्मिक, सामाजिक और तार्किक वास्तविकता में परिवर्तन ले आते है।
तांत्रिक अभ्यास में एक व्यक्ति वास्तविकता को माया, भ्रम के रूप में अनुभव करता है और यह व्यक्ति को मुक्ति प्राप्त होता है।  हिन्दू धर्म द्वारा प्रस्तुत किया गया निर्वाण के कई मार्गों में से यह विशेष मार्ग तंत्र को भारतीय धर्मों के प्रथाओं जैसे योग, ध्यान, और सामाजिक संन्यास से जोड़ता है, जो सामाजिक संबंधों और विधियों से अस्थायी या स्थायी वापसी पर आधारित हैं।
तांत्रिक प्रथाओं और अध्ययन के दौरान, छात्र को ध्यान तकनीक में, विशेष रूप से चक्र ध्यान, का निर्देश दिया जाता है। जिस तरह यह ध्यान जाना जाता है और तांत्रिक अनुयायियों एवं योगियों के तरीको के साथ तुलना में यह तांत्रिक प्रथाओं एक सीमित रूप में है, लेकिन सूत्रपात के पिछले ध्यान से ज्यादा विस्तृत है।
इसे एक प्रकार का कुंडलिनी योग माना जाता है जिसके माध्यम से ध्यान और पूजा के लिए "हृदय" में स्थित चक्र में देवी को स्थापित करते है।


भारत के प्रसिद्ध योगगुरुसंपादित करें

वैसे तो योग हमेशा से हमारी प्राचीन धरोहर रही है। समय के साथ-साथ योग विश्व प्रख्यात तो हुआ ही है साथ ही इसके महत्व को जानने के बाद आज योग लोगों की दिनचर्या का अभिन्न अंग भी बन गया है। लेकिन योग के प्रचार-प्रसार में विश्व प्रसिद्ध योगगुरुओं का भी योगदान रहा है, जिनमें से अयंगर योग के संस्थापक बी के एस अयंगर और योगगुरु रामदेव का नाम अधिक प्रसिद्ध है।

बीकेएस अंयगरसंपादित करें

अयंगर को विश्व के अग्रणी योग गुरुओं में से एक माना जाता है और उन्होंने योग के दर्शन पर कई किताबें भी लिखी थीं, जिनमें 'लाइट ऑन योगा', 'लाइट ऑन प्राणायाम' और 'लाइट ऑन द योग सूत्राज ऑफ पतंजलि' शामिल हैं। अयंगर का जन्‍म 14 दिसम्‍बर 1918 को बेल्‍लूर के एक गरीब परिवार में हुआ था। बताया जाता है कि अयंगर बचपन में काफी बीमार रहा करते थे। ठीक नहीं होने पर उन्‍हें योग करने की सलाह दी गयी और तभी से वह योग करने लगे। अयंगर को 'अयंगर योग' का जन्‍मदाता कहा जाता है। उन्होंने इस योग को देश-दुनिया में फैलाया। सांस की तकलीफ के चलते 20 अगस्त 2014 को उनका निधन हो गया।

बाबा रामदेवसंपादित करें

बाबा रामदेव भारतीय योग-गुरु हैं, उन्होंने योगासन व प्राणायामयोग के क्षेत्र में योगदान दिया है। रामदेव स्वयं जगह-जगह जाकर योग शिविरों का आयोजन करते हैं।

योग दिवससंपादित करें

21 जून 2015 को प्रथम अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया। इस अवसर पर 192 देशों और 47 मुस्लिम देशों में योग दिवस का आयोजन किया गया। दिल्ली में एक साथ ३५९८५ लोगों ने योग का प्रदर्शन किया।इसमें 84 देशों के प्रतिनिधि मौजूद थे। इस अवसर पर भारत ने दो विश्व रिकॉर्ड बनाकर 'गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स' में अपना नाम दर्ज करा लिया है। पहला रिकॉर्ड एक जगह पर सबसे अधिक लोगों के योग करने का बना, तो दूसरा एक साथ सबसे अधिक देशों के लोगों के योग करने का। 

योग का महत्वसंपादित करें

वर्तमान समय में अपनी व्यस्त जीवन शैली कारण लोग सतोष पाने के लिए योग करते हैं। योग से न व्यक्ति का तनाव दूर होता है बल्कि मन और मस्तिष्क को भी शांति मिलती है।  योग बहुत ही लाभकारी है। योग न केवल हमारे दिमाग, मस्‍तिष्‍क को ही ताकत पहुंचाता है बल्कि हमारी आत्‍मा को भी शुद्ध करता है। आज बहुत से लोग मोटापे से परेशान हैं, उनके लिए योगा बहुत ही फायदेमंद है। योग के फायदे से आज सब ज्ञात है, जिस वजह से आज योग विदेशों में भी प्रसिद्ध है। 

योग का लक्ष्यसंपादित करें

योग का लक्ष्य स्वास्थ्य में सुधार से लाकर मोक्ष प्राप्त करने तक है।  जैन धर्म, अद्वैत वेदांत के मोनिस्ट संप्रदाय और शैव सम्रदाय के अन्तर में योग का लक्ष्य मोक्श का रूप लेता है, जो सभी सांसारिक कष्ट एवं जन्म और मृत्यु के चक्र (संसार) से मुक्ति प्राप्त करना है, उस क्षण में परम ब्रह्मण के साथ समरूपता का एक एहसास है। महाभारत में, योग का लक्ष्य ब्रह्मा के दुनिया में प्रवेश के रूप में वर्णित किया गया है, ब्रह्म के रूप में, अथवा आत्मन को अनुभव करते हुए जो सभी वस्तुएँ मे व्याप्त है।
मीर्चा एलीयाडे योग के बारे में कहते हैं कि यह सिर्फ एक शारीरिक व्यायाम ही नहीं है, एक आध्यात्मिक तकनीक भी है।  सर्वपल्ली राधाकृष्णन लिखते हैं कि समाधि में निम्नलिखित तत्व शामिल हैं: वितर्क, विचार, आनंद और अस्मिता।

योग के प्रसिद्ध ग्रन्थसंपादित करें


ग्रन्थरचयितारचनाकाल
योगसूत्रपतञ्जलि-
योगभाष्यवेदव्यासद्वितीय शताब्दी
तत्त्ववैशारदीवाचस्पति मिश्र८४१ ई
भोजवृत्तिराजा भोज११वीं शताब्दी
गोरक्षशतकगुरु गोरख नाथ११वीं-१२वीं शताब्दी
योगवार्तिकविज्ञानभिक्षु१६वीं शताब्दी
योगसारसंग्रहविज्ञानभिक्षु१६वीं शताब्दी
हठयोगप्रदीपिकास्वामी स्वात्माराम१५वीं-१६वीं शताब्दी
सूत्रवृत्तिगणेशभावा१७वीं शताब्दी
योगसूत्रवृत्तिनागेश भट्ट१७वीं शताब्दी
मणिप्रभारामानन्द यति१८वीं शताब्दी
सूत्रार्थप्रबोधिनीनारायण तीर्थ१८वीं शताब्दी
शिवसंहिताअज्ञात-
घेरण्डसंहिताघेरण्ड मुनि-
योगचूडामण्युपनिषद-

संगीत चिकित्सा

संगीत चिकित्सा सहबद्ध स्वास्थ्य व्यवसाय और वैज्ञानिक शोध का क्षेत्र है जो नैदानिक चिकित्सा और जैव-संगीत शास्त्र, संगीत ध्वनिकी, संगीत सिद्धांत, मनो-ध्वनिकी और तुलनात्मक संगीत शास्त्र की प्रक्रिया के बीच पारस्परिक संबंध का अध्ययन करता है। यह एक अंतर्वैयक्तिक प्रक्रिया है जिसमें एक प्रशिक्षित संगीत चिकित्सक, अपने मरीज़ों के स्वास्थ्य में सुधार या उनके स्वास्थ्य को बनाए रखने में मदद के लिए संगीत और उसके - यथा शारीरिक, भावनात्मक, मानसिक, सामाजिक, सौन्दर्यात्मक और आध्यात्मिक - सभी पहलुओं का उपयोग करता है। संगीत चिकित्सक परिमेय उपचार लक्ष्यों और उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए संगीतानुभव (जैसे कि गायन, गीत-लेखन, संगीत श्रवण और संगीत चर्चा, संगीत संचालन) के उपयोग द्वारा, मुख्य रूप से मरीज़ों की क्रियाशीलता और विविध क्षेत्रों (उदा. संज्ञानात्मक कार्य, संचालन कौशल, भावनात्मक और प्रभावी विकास, व्यवहार और सामाजिक कौशल) में जीवन की स्व-वर्णित गुणवत्ता को सुस्पष्ट स्तर तक विकसित करने में मदद करते हैं। संगीत चिकित्सा सेवाओं के लिए उपचार करने वाले चिकित्सक या चिकित्सकों, मनोविज्ञानियों, भौतिक चिकित्सकों और पेशेवर चिकित्सकों जैसे चिकित्सकों से युक्त अंतर्विभागीय दल द्वारा संगीत से संबद्ध सेवाएं निर्दिष्ट की जानी चाहिए.
संगीत चिकित्सक लगभग सहायक व्यवसायों के सभी क्षेत्रों में पाए जाते हैं। कुछ सामान्य रूप से पाए गए व्यवहार में शामिल हैं विशेष ज़रूरतों वाले व्यक्तियों से जुड़े विकास कार्य (संप्रेषण, संचालन कौशल, आदि), गीत लेखन तथा वृद्ध व्यक्तियों के साथ संस्मरण/अभिविन्यास सुनने का कार्य, प्रसंस्करण और विश्राम कार्य, तथा आघात के शिकार लोगों के बीच उनके भौतिक पुनर्वास के लिए तालबद्ध मनोरंजन.
तुर्की-फ़ारसी मनोवैज्ञानिक तथा संगीत सैद्धांतिक अल-फ़राबी (872–950) ने, जिन्हें यूरोप में "एल्फराबियस" के नाम से जाना जाता है, अपने निबंध मीनिंग ऑफ़ द इंटेलेक्ट में संगीत चिकित्सा का वर्णन किया है, जहां उन्होंनें आत्मा पर संगीत के उपचारात्मक प्रभाव की चर्चा की है।[1] रॉबर्ट बर्टन ने अपनी 17वीं सदी की उत्कर्ष्ट कृति द एनॉटोमी ऑफ़ मेलैन्कोली में लिखा है कि संगीत तथा नृत्य मानसिक रोगों के उपचार के लिए काफी महत्वपूर्ण है, विशेष रूप से विषाद-रोग में.[2][3][4]
इसे एक सार्थक उपचार का माना जाता है।

प्रकारसंपादित करें

संगीत चिकित्सा के आधार के संबंध में कुछ अलग विचार दर्शन प्रचलित हैं। एक शिक्षा पर आधारित है तथा दो स्वयं संगीत चिकित्सा पर आधारित, जिन दोनों की यहां संक्षेप में चर्चा की जाएगी. इसके अलावा, मनोविज्ञान पर आधारित कुछ सिद्धांत मौजूद हैं और एक तंत्रिका विज्ञान पर आधारित हैं।
शिक्षा के अलग दृष्टिकोणों में हैं ऑर्फ़-श्यूलवेर्क (ऑर्फ़), डालक्रोज़ यूरिदमिक तथा कोडली. दो दर्शन जो सीधे संगीत चिकित्सा से विकसित हुईं, वे हैं नॉर्डऑफ़-रॉबिन्स तथा संचालित कल्पना और संगीत की बॉनी विधि.[5]
संगीत चिकित्सक व्यवहारिक-भावनात्मक विकारों से पीडित लोगों के साथ कई बार काम करते हैं। इस तरह के लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए, संगीत चिकित्सकों ने संगीत चिकित्सा के विभिन्न प्रकार के मूल आधार के रूप में वर्तमान मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों को ग्रहण और प्रयोग किया है। विभिन्न मॉडलों में शामिल हैं व्यवहार संबंधी उपचार, संज्ञानात्मक व्यवहार उपचार और मनोगतिक उपचार.[6]
तंत्रिकाविज्ञान पर आधारित चिकित्सा को "तंत्रिका संबंधी संगीत चिकित्सा" (NMT) कहा जाता है। NMT की परिभाषा है "NMT संगीत की धारणा और रचना के तंत्रिका विज्ञान मॉडल, असंगीतमय मस्तिष्क और व्यवहारगत कार्यों के कार्यात्मक परिवर्तनों पर संगीत के प्रभाव पर आधारित है।" दूसरे शब्दों में, NMT इस बात का अध्ययन करता है कि संगीत के बिना दिमाग़ कैसे होता है, संगीत के साथ दिमाग कैसे होता है, इनके अंतरों को मापता है और इन अंतरों का प्रयोग संगीत के द्वारा दिमाग में परिवर्तन लाने के लिए प्रयोग करता है जोकि अंततः गैर संगीतमय रोगी को प्रभावित करता है। जैसा कि अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त प्रोफ़ेसर तथा शोधार्थी डॉ॰ थॉट ने कहा है कि "दिमाग़ जो संगीत में डूब जाता है, उसे संगीत में संलग्न करके बदला जा सकता है"[7]

संयुक्त राज्य अमेरिका मेंसंपादित करें

अपने वर्तमान रूप में संगीत चिकित्सा संयुक्त राज्य अमेरिका में 1944 से प्रचलित थी, जब दुनिया में पहली बार मिशीगन स्टेट यूनिवर्सिटी में पहला स्नातकपूर्व डिग्री पाठ्यक्रम तथा कैनसास विश्वविद्यालय में पहली बार स्नातक पाठ्यक्रम शुरू किया गया। अमेरिकन म्यूज़िक थेरैपी एसोसिएशन (AMTA) की स्थापना 1998 में, संगीत चिकित्सा के लिए राष्ट्रीय संगठन (NAMT, 1950 में स्थापित) तथा संगीत चिकित्सा के अमरीकी संगठन (AAMT, 1971 में स्थापित) के बीच विलय के रूप में की गई। कई अन्य राष्ट्रीय संगठन मौजूद हैं, जैसे इंस्टीट्यूट फॉर म्यूजिक एंड न्यूरोलॉजिक फ़ंक्शन, नोर्डॉफ़-रोबिन्स सेंटर फ़ॉर म्यूज़िक, तथा द बॉनी फाउंडेशन. संगीत चिकित्सक भाषण/भाषा, शारिरिक चिकित्सादवाईसेवा-सुश्रुषाशिक्षा आदि जैसे विभिन्न विषयों से उपायों या सिद्धांतों का उपयोग कर सकते हैं।
एक संगीत चिकित्सा स्नातक अभ्यर्थी, संगीत चिकित्सा में स्नातकपूर्व, मास्टर, या डॉक्टरेट डिग्री प्राप्त कर सकता है। अनेक AMTA अनुमोदित प्रोग्राम संगीत चिकित्सा में उन छात्रों के लिए समानक और प्रमाणपत्र डिग्री पेश करते हैं जिन्होंने इससे संबंधित क्षेत्र में डिग्री पूरा किया है। कुछ अभ्यासरत संगीत चिकित्सकों ने गैर-संगीत-चिकित्सा (किंतु संबंधित) क्षेत्र में पी.एच.डी की उपाधि पाई है, लेकिन हाल ही में टेम्पल विश्वविद्यालय तथा लेसली विश्वविद्यालय ने एक सही संगीत चिकित्सा पी.एच.डी प्रोग्राम की स्थापना की है। संगीत चिकित्सक आम तौर पर ऐसे तरीके से अभ्यास करेंगे जिसमें व्यापक नैदानिक प्रथाओं जैसे मूल्यांकन, निदान, मनोचिकित्सा, पुनर्वास तथा जनसंख्या पर आधारित अन्य अभ्यासों के साथ संगीत चिकित्सा तकनीक भी शामिल हो. सामाजिक सेवा, शैक्षिक, या हेल्थ केयर एजेंसियों के संदर्भ में दी गई संगीत चिकित्सा सेवाओं की प्रतिपूर्ति, गतिविधि चिकित्सा शीर्ष के अधीन, कतिपय विशेष आवश्यकता वाले व्यक्तियों के लिए बीमा तथा निधीयन स्रोतों से की जा सकती है। संगीत चिकित्सा सेवाओं को मेडिकएड, मेडिकेयर, निजी बीमा योजना तथा राज्य विभाग तथा सरकारी कार्यक्रमों जैसी अन्य सेवाओं के अधीन प्रतिपूर्ति के लिए पहचाना गया है।
एक संगीत चिकित्सक CMT, ACMT, या RMT पद संभाल सकता है- संकेताक्षर जिन्हें पहले अब अप्रचलित AAMT तथा NAMT द्वारा दिए गए थे। वर्तमान में संगीत चिकित्सक, राष्ट्रीय प्रमाणन बोर्ड परीक्षा उत्तीर्ण करके संगीत चिकित्सक प्रमाणन बोर्ड द्वारा प्रदत्त, MT-BC, संगीत चिकित्सा-बोर्ड प्रमाणित प्रत्यय पत्र प्राप्त करते हैं। संगीत चिकित्सा में डिग्री के लिए, गिटार, पियानो, स्वर, संगीत सिद्धांत, संगीत इतिहास, संगीत पठन, तात्कालिक प्रदर्शन तथा इसके साथ ही मूल्यांकन, प्रलेखन और अन्य परामर्शी और स्वास्थ्य कौशल के भिन्न स्तरों में प्रवीणता की आवश्यकता होती है जो विशिष्ट विश्वविद्यालय के कार्यक्रम के संकेंद्रण पर आधारित होता है।
बोर्ड से प्रमाणीकृत होने के लिए, एक संगीत चिकित्सक के लिए कॉलेज या विश्वविद्यालय से AMTA मान्यता प्राप्त प्रोग्राम पूरा करना जरूरी है, इसके साथ ही संगीत चिकित्सा इंटर्नशिप सफलतापूर्वक पूरा करना होगा तथा संगीत चिकित्सा में बोर्ड प्रमाणन परीक्षा उत्तीर्ण करना भी आवश्यक है। प्रत्यय-पत्र अनुरक्षण के लिए, या तो प्रत्येक पांच वर्ष में सतत शिक्षा के 100 यूनिट अवश्य पूरे करने होंगे या पांच वर्ष के चक्र समापन पर बोर्ड परीक्षा देनी चाहिए. यूनिटों को संगीत चिकित्सा में जारी पूर्णता के लिए संगीत चिकित्सक प्रमाणन बोर्ड की परिधि के तहत क्रेडिट माना गया है।

यूनाइटेड किंगडम मेंसंपादित करें

दोनों विश्वयुद्धों के पश्चात अस्पतालों में स्वास्थ्य लाभ पाने वाले सैनिकों के रहन सहन के अंश के रूप में प्रत्यक्ष संगीत का उपयोग किया गया था। आज की अवधारणाओं के अनुसार, ब्रिटेन में नैदानिक संगीत चिकित्सा का पथप्रदर्शन फ्रांस की सेलोवादक जूलियट एल्विन द्वारा किया गया था, जिनका प्रभाव वर्तमान पीढ़ी के ब्रिटिश संगीत चिकित्सा व्याख्याताओं पर आज भी बरकरार है। एल्विन के छात्रों में से एक, मेरी प्रीसले ने "विश्लेषणात्मक संगीत चिकित्सा" की खोज की. विश्लेषणात्मक संगीत चिकित्सा, संगीत चिकित्सा का एक ऐसा रूप है जो नोर्डॉफ़-रॉबिन्स स्कूल ऑफ़ म्यूज़िक थेरैपी के साथ मिलकर, आज प्रयुक्त संगीत चिकित्सा के दो केंद्रीय प्रारूप बनाती है। मेरी प्रीसले की किताबें, म्यूज़िक थेरैपी इन एक्शन पहली बार कॉन्स्टेबल एंड कंपनी ©1975 (ISBN 0-09-459900-9) द्वारा प्रकाशित तथा एसेज़ ऑन एनलिटिकल म्यूज़िक थेरैपी, बार्सीलोना पब्लिशर्स ©१९९४ (ISBN 0-9624080-2-6) समस्त विश्व में विश्लेषणात्मक संगीत चिकित्सा के छात्रों के पाठ्यक्रम का मुख्य भाग है।
नोर्डॉफ़-रॉबिन्स ने पॉल नॉर्डॉफ़ तथा क्लाइव रॉबिन्स के कार्य से 1950/60 के दशक में विकसित संगीत चिकित्सा को अपनाया. यह इस धारणा पर आधारित है कि कोई चाहे कितना ही बीमार या अक्षम क्यों ना हो, वह संगीत पर प्रतिक्रिया अवश्य देता है। चिकित्सा के रूप में संगीत के गुण, संप्रेषण बढ़ा सकते हैं, बदलाव को समर्थित कर सकते हैं तथा लोगों को अधिक साधन-संपन्न और रचनात्मक रूर से जीने में सक्षम बनाते हैं। अब नोर्डॉफ़-रोबिन्स पूरे ब्रिटेन, संयुक्त राज्य अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया तथा जर्मनी में संगीत चिकित्सा सत्र चलाते हैं। इसका मुख्यालय लंदन में है, जहां ये केवल ब्रिटेन में उपलब्ध संगीत चिकित्सा में पी.एच.डी पाठ्यक्रम सहित, प्रशिक्षण तथा अग्रगामी शिक्षा कार्यक्रम प्रदान करते हैं। संगीत चिकित्सक, जिनमें से अधिकांश आशुरचना मॉडल (नैदानिक आशुरचना देखें) के साथ कार्य करते हैं, न केवल बच्चे और वयस्क शिक्षा विकलांगता के क्षेत्र में विशेष रूप से सक्रिय हैं, बल्कि मनोरोग चिकित्सा और न्यायिक मनोविज्ञान, जराचिकित्सा, प्रशामक देखभाल तथा अन्य क्षेत्र में भी सक्रिय हैं।
चिकित्सक, स्वास्थ्य व्यवसाय परिषद[8] के साथ पंजीकृत हैं तथा 2007 से नए पंजीकरणकर्ताओं का सामान्य रूप से संगीत चिकित्सा में मास्टर डिग्री धारक होना आवश्यक है। ब्रिस्टॉल, केम्ब्रिज, कॉर्डिफ़एडिनबर्ग तथा लंदन में मास्टर स्तर के प्रोग्राम हैं तथा पूरे ब्रिटेन में चिकित्सक मौजूद हैं। एसोसिएशन फ़ॉर प्रोफ़ेशनल म्यूज़िक थेरैपिस्ट[9] ब्रिटेन का पेशेवर तंत्र है जबकि ब्रिटिश सोसाइटी फ़ॉर म्यूज़िक थेरैपी[10] एक कल्याण संस्था है जो संगीत चिकित्सा के बारे में जानकारी प्रदान कराती है।
2002 में, बातचीत और वाद-विवाद विषय पर वर्ल्ड कांग्रेस ऑफ़ म्यूज़िक थेरैपी का ऑक्सफ़ोर्ड में आयोजन हुआ।[11]नवंबर 2006 में, डॉ॰ मिशेल जे.क्रॉफ़ोर्ड[12] तथा सहकर्मियों ने फिर से पाया कि संगीत चिकित्सा मनोभाजित रोगियों की सहायता करती है।[13][14] 2009 में वे तथा उनका दल, घबराहट तथा मनोभ्रंश रोगियों की सहायता में आशुरचना संगीत की उपयोगिता पर अनुसंधान कर रहे थे।

भारत मेंसंपादित करें

वैदिक विज्ञान ने भारतीय शास्त्रीय संगीत 'रागों' में चिकित्सा प्रभाव होने का दावा किया है। प्राचीन काल से ही संगीत को बारंबार चिकित्सीय कारक के रूप में उपयोग में लाया जाता रहा है। भारत में संगीत, मधुर ध्वनि के माध्यम से एक योग प्रणाली की तरह है, जो मानव जीव पर कार्य करती है तथा आत्मज्ञान की हद के लिए उनके उचित कार्यों को जागृत तथा विकसित करती हैं, जोकि हिंदू दर्शन और धर्म का अंतिम लक्ष्य है। मधुर लय भारतीय संगीत का प्रधान तत्व है। 'राग' का आधार मधुर लय है। विभिन्न 'राग' केन्द्रीय तंत्रिका प्रणाली से संबंधित अनेक रोगों के इलाज में प्रभावी पाए गए हैं। चिकित्सा के रूप में संगीत के प्रयोग करने से पहले यह अवश्य पता करना चाहिए कि किस प्रकार के संगीत का उपयोग हो. संगीत चिकित्सा का सिद्धांत, सही स्वर शैली तथा संगीत के मूल तत्वों के सही प्रयोग पर निर्भर करता है। जैसे कि नोट्स [स्वर] लय, तीव्रता, ताल तथा रागों के अंश.
राग अनगिनत है तथा निश्चित रूप से प्रत्येक राग के अपने ही अनगिनत गुण हैं। यही कारण है कि हम किसी विशेष राग को किसी विशेष रोग के लिए स्थापित नहीं कर सकते हैं। विभिन्न मामलों में अलग-अलग प्रकार के रागों का प्रयोग किया जाता है। जब संगीत चिकित्सा शब्द का प्रयोग होता है तो हम चिकित्सा की विश्वव्यापी प्रणाली के बारे में सोचते हैं। इस मामले में भारतीय शास्त्रीय संगीत का गायन भाग का साहित्य पर्याप्त नहीं है। अपने अद्वितीय स्वरों/तालों की संरचना के साथ शास्त्रीय संगीत शांत और आरामदायक मनोभावना सुनिश्चित करता है और उत्तेजना पैदा करने वाली स्थितियों से जुड़ी संवेदना को शांत करता है। संगीत तथाकथित भावनात्मक असंतुलन को जीतने में एक प्रभावी भूमिका निभाता है। भारत में प्रत्येक वर्ष 13 मई को संगीत चिकित्सा दिवस के रूप में मनाया जाता है।

आघात (स्ट्रोक) चिकित्सा के रूप मेंसंपादित करें

संगीत को मस्तिष्क के कुछ भागों को प्रभावित करते हुए दिखाया गया है। इस चिकित्सा का एक भाग, भावनाओं और सामाजिक संबंधों को प्रभावित करने की संगीत क्षमता से है। नायक और अन्य द्वारा किए गए अनुसंधान से पता चला है कि संगीत चिकित्सा, अवसाद में कमी, बेहतर मनोदशा और चिंता की अवस्था में कमी के साथ जुड़ी हुई है।[15]वर्णनात्मक और प्रायोगिक, दोनों अध्ययनों ने जीवन की गुणवत्ता, पर्यावरण के साथ भागीदारी, भावनाओं की अभिव्यक्ति, जागरूकता और प्रतिक्रिया, सकारात्मक संघों और समाजीकरण पर संगीत का प्रभाव प्रलेखित किया है।[16] इसके अतिरिक्त, नायक और अन्य ने पाया कि सामाजिक और व्यावहारिक परिणामों पर संगीत चिकित्सा का सकारात्मक असर पड़ा है और इसने मनोदशा के संबंध में कुछ उत्साहजनक रुझान दिखाए.[15]
हाल ही के शोध से पता चलता है कि संगीत, मरीज़ की प्रेरणा और सकारात्मक भावनाओं को बढ़ा सकता है।[15][17][18] वर्तमान शोध से यह भी पता चलता है कि जब संगीत चिकित्सा को पारंपरिक चिकित्सा के साथ संयोजित रूप में प्रयोग किया जाता है, तब यह सफलता दर में काफी सुधार लाता है।[19][20][21] इसलिए, यह धारणा बनी है कि संगीत चिकित्सा आघात (स्ट्रोक) के शिकार व्यक्तियों को तेजी से ठीक होने में मदद करती है और यह रोगी की सकारात्मक भावनाओं और प्रेरणा में वृद्धि कर उन्हें परंपरागत चिकित्सा में भाग लेने और अधिक सफलता प्राप्त करने के लिए प्रेरित करने में सफल सिद्ध हुई है।
अनुसंधान ने यह दर्शाया है कि संगीत चिकित्सा में आघात (स्ट्रोक) रोगियों में सकारात्मक सामाजिक संबंधों, सकारात्मक भावनाओं और प्रेरणा में वृद्धि करने की क्षमता है। व्हीलर और अन्य ने पाया कि संगीत चिकित्सा के समूह सत्रों से आघात (स्ट्रोक) रोगियों द्वारा सामाजिक संपर्क करने और प्रतिक्रिया करने की सुगमता में वृद्धि हुई और रोगी के परिवारों से सकारात्मक दृष्टिकोण रिपोर्ट में वृद्धि हुई, जबकि व्यक्तिगत सत्र से रोगियों को इलाज के लिए प्रेरित करने में मदद मिली.[18] एक अन्य अध्ययन ने आघात (स्ट्रोक) रोगियों की मनोदशा पर संगीत चिकित्सा के प्रभाव की जांच की और इसी तरह के परिणाम पाए, एवं चिंता, थकान और प्रतिकूल मनोदशा में कमी को दर्शाया.[17] इसके अतिरिक्त, नायक एवं अन्य ने पाया कि जब आघात (स्ट्रोक) सुधार कार्यक्रम में संगीत चिकित्सा का इस्तेमाल किया गया तब सामाजिक संपर्क (अधिक सक्रिय रूप से शामिल और सहकारी) में सुधार पाया गया।[15]
हाल के अध्ययनों ने आघात (स्ट्रोक) रोगियों पर पारंपरिक चिकित्सा के साथ संयुक्त रूप से संगीत चिकित्सा के प्रभाव की जांच की है। एक अध्ययन ने यह पाया कि संगीत के समावेश के साथ चिकित्सकीय ऊपरी शिरा व्यायाम ने, अकेले व्यायाम करने की तुलना में रोगियों में अधिक सकारात्मक भावनात्मक प्रभाव दिया है।[19] एक अन्य अध्ययन में, नायक और अन्य ने पाया गया कि पुनर्वास कर्मचारियों ने संगीत चिकित्सा समूह में शामिल प्रतिभागियों को नियंत्रण समूह में शामिल प्रतिभागियों की तुलना में चिकित्सा में अधिक सक्रिय और सहकारी वरीयता प्रदान की है।[15] उनके निष्कर्षों ने सामाजिक कार्यकलापों हेतु एक पूरक चिकित्सा के रूप में संगीत चिकित्सा की प्रभावकारिता एवं तीव्र पुनर्वास के दौरान मनोदशा में सुधार की प्रवृत्ति की ओर पुनर्वास में भागीदारी को प्रारंभिक समर्थन दिया.
हालांकि सकारात्मक परिवर्तनों को संगीत चिकित्सा के साथ संबद्ध किया गया है, पर कुछ बातों को ध्यान में रखा जाना चाहिए. जबकि वैज्ञानिकों ने निर्धारित किया है कि संगीत सुनते समय कई तरह के शारीरिक और मानसिक परिवर्तन होते हैं, लेकिन संगीत और भावनाओं के बीच के रिश्ते और रिश्ते की दिशा को ध्यान में रखते हुए व्यापक निष्कर्षों पर नहीं पहुंचा जा सकता है।[22] इसके अतिरिक्त, ऐसे मध्यस्थ कारक हो सकते हैं जो संगीत चिकित्सा की सफलता को प्रभावित कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, नायक और अन्य ने पाया कि चिकित्सा के प्रारंभ में एक व्यक्ति का सामाजिक व्यवहार जितना अधिक बिगड़ा हुआ होगा, उस व्यक्ति को संगीत चिकित्सा से उतना ही अधिक लाभ प्राप्त होने की संभावना है।[15] इसके अतिरिक्त, उन्होंने यह पाया कि चिकित्सा की समय सीमा द्वारा संगीत चिकित्सा के प्रभाव को संतुलित किया जा सकता है। यह संभव है कि चोट के निकट समय पर संगीत चिकित्सा का मनोदशा (मूड) पर अधिक स्पष्ट प्रभाव पड़े.
वर्तमान शोध से पता चलता है कि जब संगीत चिकित्सा का उपयोग पारंपरिक चिकित्सा के साथ संयोजित रूप में किया जाता है, तब यह आघात (स्ट्रोक) के परिणामस्वरूप उत्पन्न भावनात्मक और सामाजिक कमी में होने वाले सुधार की दर में वृद्धि लाता है।[15][19][20][21][23][24] जियांग और किम द्वारा किए गए अध्ययन ने एक समुदाय आधारित पुनर्वास कार्यक्रम में पारंपरिक आघात चिकित्सा के साथ संगीत चिकित्सा को संयुक्त करने पर होने वाले प्रभाव की जांच की है।[23] आघात (स्ट्रोक) से बचे तैंतीस व्यक्तियों को बेतरतीब तरीके से दो समूहों में बांटा गया: प्रायोगिक समूह, जिसमें आठ सप्ताह तक विशेष पुनर्वास कार्यक्रम और लयबद्ध संगीत को संयुक्त किया गया; एवं एक नियंत्रण समूह, जिसने पारंपरिक चिकित्सा की परामर्श जानकारी प्राप्त की (जिनकी चिकित्सा पारंपरिक तरीके से हुई मानी गई)। इस अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि प्रायोगिक समूह के प्रतिभागियों ने अधिक लचीलापन, गति की व्यापक रेंज, अधिक सकारात्मक मनोदशा और सामाजिक संबंधों की बढ़ी हुई आवृत्ति और गुणवत्ता प्राप्त की.[23]
संगीत का संचालन कौशल के सुधार में भी इस्तेमाल किया गया है। परंपरागत चाल चिकित्सा के साथ संगीत के संदर्भ में तालबद्ध श्रवण उत्तेजना (रिदमिकल ऑडीटरी स्टीमुलेशन) के संयोजन ने आघात (स्ट्रोक) रोगियों की चलने की क्षमता में सुधार किया।[20] अध्ययन में दो उपचार दशाएं शामिल थीं, एक जिसने परंपरागत चाल चिकित्सा प्राप्त की और एक अन्य जिसने तालबद्ध श्रवण उत्तेजना (रिदमिकल ऑडीटरी स्टीमुलेशन) के संयोजन के साथ परंपरागत चाल चिकित्सा प्राप्त की. तालबद्ध श्रवण उत्तेजना के दौरान, माप के अनुसार उत्तेजना या ध्वनि को बजाया गया और इसे रोगी की एड़ी पर प्रहार करके प्रारंभ किया गया। हर दशा ने चिकित्सा के पंद्रह सत्र प्राप्त किये. परिणामों से पता चला कि तालबद्ध श्रवण उत्तेजना समूह ने केवल परंपरागत चिकित्सा प्राप्त करने वाले समूह की तुलना में छलांग लंबाई, समरूपता विचलन, चलने की गति और रोल ओवर पथ लंबाई (चलने के ढंग में सुधार के सभी संकेतक) अधिक सुधार दिखाया.[20]
श्नाइडर और अन्य ने भी मानक संचालक पुनर्वास तरीकों के साथ संगीत चिकित्सा के संयोजन के प्रभाव का अध्ययन किया है।[21] इस प्रयोग में, शोधकर्ताओं ने ऐसे आघात (स्ट्रोक) रोगियों को भर्ती किया जिन्हें पहले से संगीत का कोई अनुभव नहीं था और उनमें से आधे लोगों को चरणबद्ध तरीके से एक गहन प्रशिक्षण कार्यक्रम में प्रशिक्षित किया गया जो कि पारंपरिक चिकित्सा के अलावा तीन सप्ताह में पंद्रह से अधिक बार आयोजित हुआ। इन प्रतिभागियों को पियानो और ड्रम के प्रयोग को समझाते हुए बेहतर और सकल, दोनों प्रेरक संचलनों को प्रयोग करने का प्रशिक्षण प्रदान किया। अन्य आधे रोगियों ने तीन सप्ताह तक केवल परंपरागत उपचार प्राप्त किया। तीन आयामी आंदोलन विश्लेषण और नैदानिक प्रेरक परीक्षणों ने यह दिखाया कि नियंत्रित विषयों के प्रतिभागियों की तुलना में ऐसे प्रतिभागियों ने बेहतर गति, शुद्धता और आसान संचलन दिखाया, जिन्हें संगीत चिकित्सा अतिरिक्त रूप से प्राप्त हुई थी। संगीत चिकित्सा प्राप्त करने वाले प्रतिभागियों ने नियंत्रित समूहों की तुलना में रोजमर्रा की मोटर गतिविधियों में महत्वपूर्ण सुधार दिखाया.[21] विल्सन, पार्सन्स और रियूटन्स ने गहन ब्रोका वाचाघात (Broca's aphasia) वाले पुरुष गायक की बोली उत्पादन पर मेलोडिक इन्टोनेशन चिकित्सा (MIT) के प्रभाव को देखा.[24] इस अध्ययन में, तीस अभिनव वाक्यांशों को तीन दशाओं में सिखाया गया: पूर्वाभ्यास (रिहर्सल) बिना, पूर्वाभ्यासित मौखिक उत्पादन (दोहराव), या राग के साथ पूर्वाभ्यासित मौखिक उत्पादन (MIT). नतीजे बताते हैं कि MIT दशा में पढ़ाए गये वाक्यांशों का उत्पादन बेहतर रहा और पूर्वाभ्यास की तुलना में, MIT का प्रभाव लंबे समय तक चला.
एक अन्य अध्ययन ने आघात (स्ट्रोक) के शिकार लोगों की दर्द की धारणा पर चिकित्सकीय ऊपरी शिरा व्यायाम के साथ संगीत के समावेश की जांच की.[19] आठ सप्ताह के दौरान, आघात (स्ट्रोक) के शिकार लोगों ने ऊपरी शिरा व्यायाम (हाथ, कलाई और कंधे के जोड़ों के) में इन तीन दशाओं में से एक के संयोजन के रूप में भाग लिया: गीत, कराओके संगत और संगीत के बिना. प्रतिभागियों ने प्रत्येक दशा में एक यादृच्छिक तरीके के अनुसार भाग लिया और सत्र के तुरंत बाद अपने कथित पीड़ा ग्रहण को वरीयता प्रदान की. परिणामों से पता चला है कि हालांकि विभिन्न दशाओं में दर्द की वरीयता में कोई महत्वपूर्ण अंतर नहीं था, संगीत और कराओके संगत के साथ ऊपरी शिरा व्यायाम करते समय वीडियो प्रेक्षण से अधिक सकारात्मक प्रभाव और मौखिक प्रतिक्रियाओं का खुलासा हुआ।[19] नायक और अन्य ने परंपरागत आघात पुनर्वास के साथ संगीत चिकित्सा के संयोजन का परीक्षण किया और यह भी पाया कि संगीत चिकित्सा के जुड़ने से मनोदशा और सामाजिक संबंधों में सुधार हुआ।[15] ऐसे प्रतिभागियों को जिन्हें आघातीय मस्तिष्क चोट या आघात (स्ट्रोक) का सामना करना पड़ा, दो स्थितियों में से एक में रखा गया: मानक पुनर्वास या संगीत चिकित्सा के साथ मानक पुनर्वास. प्रतिभागियों ने दस उपचारों तक प्रति सप्ताह तीन उपचार प्राप्त किए. चिकित्सकों ने पाया कि पारंपरिक तरीकों के साथ संयोजन के रूप में संगीत चिकित्सा प्राप्त करने वाले प्रतिभागियों के सामाजिक संपर्क और मनोदशा में सुधार हुआ।

हृदय रोग मेंसंपादित करें

2009 में हुए 23 नैदानिक परीक्षणों की कोच्रेन समीक्षा के अनुसार कुछ संगीत कोरोनरी हृदय रोगों से पीड़ित रोगियों में हृदय दर, श्वसन दर और रक्तचाप को कम कर सकते हैं।[25]इन लाभों में हृदय रोगियों के रक्तचाप, हृदय की दर और चिंता के स्तरों में कमी शामिल है। यद्यपि, जोक ब्रेट, PhD तथा चेर्ली डीलिओ, PhD (दोनों टेम्पल विश्वविद्यालय, फिलाडेल्फिया से) के अनुसार ये प्रभाव अध्ययनों के समरूप नहीं थे। रोगियों के मनोवैज्ञानिक पीड़ा पर संगीत का अधिक प्रभाव नहीं देखा गया। "सबूत की गुणवत्ता मजबूत और नैदानिक महत्व स्पष्ट नहीं है", समीक्षकों ने चेताया. 11 अध्ययनों में मरीज़ हृदय शल्य-चिकित्सा और प्रक्रियाओं से पीड़ित थे, नौ में MI के रोगी थे, तथा तीन हृदय सुधार रोगी थे। 1,461 प्रतिभागियों में अधिकतर गोरे (औसतन 85%) तथा पुऱूष (67%) थे। अधिकतर अध्ययनों में रोगियों ने एक 30 मिनट का संगीत सत्र सुना. केवल दो ने ही संगीत सुनने के बजाय प्रशिक्षित संगीत चिकित्सक का उपयोग किया।

मिर्गी मेंसंपादित करें

शोध बताते हैं कि मोज़ार्ट के पियानो सोनाटा K448 को सुनने से मिर्गी के मरीज में दौरों की संख्या कम की जा सकती है।[26] इसे "मोज़ार्ट प्रभाव" कहा जाता है। यद्यपि, हाल के समय में, "मोज़ार्ट प्रभाव" की वैधता तथा इस सिद्धांत तक पहुंचने के लिए हुए अध्ययनों पर संदेह किया जाता है, ऐसा मूल अध्ययन के तहत सीमाओं तथा बाद के अध्ययनों में मोज़ार्ट संगीत के प्रभावों को सिद्ध करने में प्रस्तुत होने वाली कठिनाइयों के कारण हुआ है।

अग्रसर-संगीत चिकित्सासंपादित करें

संगीत चिकित्सक, संगीत शोधक, तथा प्रयोगात्मक संगीतकार इनरीको कुरेरी ने अमरीकी संगीतकार जॉन केज द्वारा विकसित चिकित्सकीय सिद्धांतों और अवधारणाओं का पता लगाया. उदाहरण के लिए, कुरेरी ने विभिन्न संगीत चिकित्सा सत्रों में अवसाद और चिंता विकार से पीड़ित रोगियों को केज की मौलिक रचना मौन 4′33″ तथा प्रयुक्त सांयोगिक/ अवसर प्रक्रियाओं पर प्रदर्शन किया करते हैं।[27]इसके अतिरिक्त, कुरेरी, मानसिक रोग से पीड़ित व्यस्क रोगियों के साथ प्रयोगात्मक संगीत/ध्वनि/शोरगुल भरा संगीत, मुक्त आशुरचना और सूक्षमध्वनि संगीत का प्रयोग करके रचनात्मकता की प्रक्रिया की चिकित्सकीय जांच कर रहे हैं।

उल्लेखनीय चिकित्सक और लेखकसंपादित करें

  • अल-फ़राबी
  • जुलिएट एल्विन
  • हेलेन बॉनी
  • ई. थेयर गैस्टन
  • पॉल नॉर्डाफ़ और नॉर्डाफ़-रॉबिन्स के क्लाइव रॉबिन्स
  • मेरी प्रीस्ट्ले
  • कॉनसेटा एम. टोमैनो
  • डॉ॰ भास्कर खांडेकर, भारत के पहली संगीत चिकित्सक

सन्दर्भसंपादित करें

  1.  [21] ^फ्लड, पी. 94.
  2.  [22] ^ पोस्सेह्ल (2003), पीपी. 144-145
  3.  देखें: McEvilley, Thomas (2002). The shape of ancient thought. Allworth Communications. पृ. 219-220. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9781581152036http://books.google.com/books?id=Vpqr1vNWQhUC&pg=PA219.
    • डॉ॰ फरजंद मसीह, पंजाब विश्वविद्यालय के पुरातत्व विभाग के अध्यक्ष, हाल ही में प्राप्त एक मुद्रा का वर्णन एक योगी के रूप का कहते है। अपूर्व वस्तुओं की खोज खंडहर में निहित खजाने की ओर संकेत करता है।
    • गेविन फ्लड, "पशुपति सील" जोकि अन्य सीलों मे से एक है, के बारे में विवाद करते हुए लिखते है कि यह रूप एक योग मुद्रा में बैठे व्यक्ति की स्पष्ट नहीं लगती या यह एक मानव आकृति का प्रतिनिधित्व करती लगती है। फ्लड, पीपी. 28-29 .
    • पशुपति सील के बारे में जियोफ्रे सामुएल का मानना है कि,"वास्तव में हमें यह स्पष्ट नहीं है कि यह मूर्ति किसी नारी या पुरुष, किसकी व्याख्या करती है".Samuel, Geoffrey (2008). The Origins of Yoga and Tantra. Cambridge University Press. प॰ 4. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9780521695343http://books.google.com/books?id=JAvrTGrbpf4C&pg=PA4.[26]
  4.  [27] ^ फ्लड, पीपी. 94-95.
  5.  [28] ^ अलेक्जेंडर व्य्न्न, दी ओरिजिन ऑफ़ बुद्धिस्ट मेडिटेशन. रौतलेड्ग 2007, पृष्ठ 51.
  6.  [29] ^ अलेक्जेंडर व्य्न्न, दी ओरिजिन ऑफ़ बुद्धिस्ट मेडिटेशन. रौतलेड्ग 2007, पृष्ठ 56.
  7.  [30] ^ अलेक्जेंडर व्य्न्न, दी ओरिजिन ऑफ़ बुद्धिस्ट मेडिटेशन. रौतलेड्ग 2007, पृष्ठ 51.
  8.  [31] ^ रिचर्ड गोम्ब्रिचथेरावदा बौद्ध धर्म: ए सोशल हिस्ट्री फ्रॉम इंसिएंत बनारस टू माडर्न कोलम्बो. रौतलेड्ग और केगन पॉल, 1988, पृष्ठ 44.
  9.  [32] ^ अलेक्जेंडर व्य्न्न, दी ओरिजिन ऑफ़ बुद्धिस्ट मेडिटेशन. रौटलेड्ज 2007, पृष्ट 50
  10.  [33] ^ फ्लड, पी. 95. विद्वानों कथा उपनिषद को पूर्व बौद्धत्व के साथ सूचीबद्ध नहीं करते, उदाहरण के लिए हेल्मथ वॉन ग्लासेनप्प देख सकते हैं,1950 कार्यवाही की "अकादेमी देर विस्सेंस्चाफ्तें," लितेरातुर अंड से http://www.accesstoinsight.org/ lib/authors/vonglasenapp/wheel002.html.कुछ लोग कहते हैं कि यह पद बौद्ध है, उदाहरण हाजिम नाकामुरा का ए हिस्ट्री ऑफ़ एअर्ली वेदान्त फिलोसोफी, फिलोसोफी ईस्ट अंड वेस्ट, वोल. 37, अंख. 3 (जुलाई., 1987) जिसे अरविंद शर्मा ने समीक्षा की है, पीपी. 325-331. पाली शब्द "योग" का उपयोग करने की एक व्यापक जांच के लिए पूर्व बौद्ध ग्रंथों में देखे, थॉमस विलियम र्ह्य्स डेविड, विलियम स्टेड, पाली-इंग्लिश शब्दकोष. मोतीलाल बनारसीदास पुब्ल द्वारा डालें., 1993, पृष्ठ 558: http://books.google.com/books?id=xBgIKfTjxNMC&pg=RA1-PA558&dq=yoga+pali+ term&ir = # PRA1 lr-PA558, M1. धम्मपदा में "आध्यात्मिक अभ्यास" के अर्थ में इस शब्द का प्रयोग के लिए देखे गिल फ्रोंस्दल, दी धम्मपदा, शम्भाला, 2005, पृष्ठ 56, 130 देखा.
  11.  [35] ^ छह रूढ़िवादी स्कूलों के एक सिंहावलोकन के लिए, समूह पर विस्तार के साथ देखें : राधाकृष्णन अंड मूर, "सामग्री" और पीपी. स्कूलों [35] ^453-487.
  12.  [36] ^ योग घराने के एक संक्षिप्त सिंहावलोकन के लिए देखें: चटर्जी अंड दत्ता, पी. 43.
  13.  [37] ^ दर्शन और संख्या के बीच घनिष्ठ संबंध के लिए देखें: चटर्जी अंड दत्ता, पी. 43.
  14.  [38] ^ अवधारणाओं के योग स्वीकृति के लिए, लेकिन भगवान के लिए एक वर्ग के जोड़ने की क्रिया के साथ देखें: राधाकृष्णन अंड मूर, पी. 453.
  15.  [39]^ Samkhya के 25 सिद्धांतों को योगा ने स्वीकार करने के लिए देखें: चटर्जी अंड दत्ता, पी. 43.
  16.  [40] ^ म्युलर (1899), अध्याय 7, "योग फिलोसोफी", पी. १०४.
  17.  [42] ^ ज़िम्मेर (1951), पी. 280.
  18.  [43] ^ दार्शनिक प्रणाली के संस्थापक पतांजलि योग को यह रूप दिया, देखें:चटर्जी अंड दत्ता, पी. 42
  19.  [44] ^ मन के नियंत्रण के लिए एक तंत्र के रूप में "राजा योग" के लिए और एक महत्वपूर्ण कार्य के रूप में पतांजलि के योग सूत्र के साथ संबंध के लिए देखे: फ्लड (1996), पीपी. 96-98.
  20.  Patañjali (2001-02-01). "Yoga Sutras of Patañjali" (etext). Studio 34 Yoga Healing Arts. Retrieved 2008-11-24.
  21.  पाठ और शब्द मे से शब्द अनुवाद के लिए देखे:तैम्नी पी."योग इस दी इनहिबिशन ऑफ़ दी मोडीफिकेशंस ऑफ़ दी मैंड" 6.
  22.  [53] ^ बारबरा स्टोलेर मिलर, योगा:डिसिप्लिन टू फ्रीडम योग सूत्र पतांजलि को आरोपित किया है, पाठ का अनुवाद, टीका, परिचय और शब्दावली खोजशब्द के साथ. कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रेस, 1996, पृष्ठ 9.
  23.  [54] ^ विवेकानाडा, पी. 115
  24.  [55] ^ स्टीफन एच. फिलिप्स, क्लास्सिकल इंडियन मेताफ्य्सिक्स: रेफुताशन्स ऑफ़ रेअलिस्म अंड दी एमेर्गेंस ऑफ़ "न्यू लॉजिक". ओपन कोर्ट प्रकाशन, 1995, पृष्ठ 12-13.
  25.  [57] ^ जकोब्सन, पी. 10.
  26.  [58] ^ भगवद गीता, एक पूरा अध्याय (ch. 6) पारंपरिक योग का अभ्यास करने के लिए समर्पित सहित. इस गीता मे योग के प्रसिद्ध तीन प्रकारों, जैसे 'ज्ञान' (ज्ञान), 'एक्शन'(कर्म) और 'प्यार' (भक्ति) का परिचय किया है।" फ्लड, पी. 96
  27.  [59] ^ गम्भिरानान्दा, पी. 16
  28.  [60] ^ जकोब्सन, पी. 46.
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आगे पढ़ेंसंपादित करें

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योग को विक्षनरी,
एक मुक्त शब्दकोष में देखें।
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अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस
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दिल्ली में 2015 में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस
आधिकारिक नामअंतर्राष्ट्रीय योग दिवस
अन्य नामयोग दिवस, विश्व योग दिवस
मनाने वालेविश्वभर में
प्रकारसंयुक्त राष्ट्र
तिथि21 जून
उत्सवयोगध्यान, सामूहिक मथंन, विचार-विमर्श, सांस्कृतिक आयोजन
अगली बार21 जून 2017
अवधि1 दिन
आवृत्ति (फ्रीक्वेंसी)वार्षिक
नियतिकरण (शेड्यूलिंग)प्रत्येक वर्ष उसी दिन
पहली बार21 जून 2015
पोर्टलidayofyoga.org
वेबसाइटmea.gov.in/idy.htm
अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 21 जून को मनाया जाता है। यह दिन वर्ष का सबसे लंबा दिन होता है और योग भी मनुष्य को दीर्घ जीवन प्रदान करता है। पहली बार यह दिवस 21 जून 2015 को मनाया गया, जिसकी पहल भारत के प्रधानमंत्रीनरेन्द्र मोदी ने 27 सितम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने भाषण से की थी जिसमें उन्होंने कहा:
"योग भारत की प्राचीन परंपरा का एक अमूल्य उपहार है यह दिमाग और शरीर की एकता का प्रतीक है; मनुष्य और प्रकृति के बीच सामंजस्य है; विचार, संयम और पूर्ति प्रदान करने वाला है तथा स्वास्थ्य और भलाई के लिए एक समग्र दृष्टिकोण को भी प्रदान करने वाला है। यह व्यायाम के बारे में नहीं है, लेकिन अपने भीतर एकता की भावना, दुनिया और प्रकृति की खोज के विषय में है। हमारी बदलती जीवन शैली में यह चेतना बनकर, हमें जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद कर सकता है। तो आयें एक अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस को गोद लेने की दिशा में काम करते हैं।"
जिसके बाद 21 जून को " अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस" घोषित किया गया। 11 दिसम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र में 193 सदस्यों द्वारा 21 जून को " अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस" को मनाने के प्रस्ताव को मंजूरी मिली। प्रधानमंत्री मोदी के इस प्रस्ताव को 90 दिन के अंदर पूर्ण बहुमत से पारित किया गया, जो संयुक्त राष्ट्र संघ में किसी दिवस प्रस्ताव के लिए सबसे कम समय है।[1]

उत्पत्तिसंपादित करें

औपचारिक व अनौपचारिक योग शिक्षकों और उत्साही लोगों के समूह ने 21 जून के अलावा अन्य तारीखों पर विश्व योग दिवस को विभिन्न कारणों के समर्थन में मनाया।[2]दिसंबर 2011 में, अंतर्राष्ट्रीय मानवतावादी, ध्यान और योग गुरू श्री श्री रविशंकर और अन्य योग गुरुओं ने पुर्तगाली योग परिसंघ के प्रतिनिधि मंडल का समर्थन किया और दुनिया को एक साथ योग दिवस के रूप में 21 जून को घोषित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र को सुझाव दिया।[3]
इसके पश्चात 'योग: विश्व शांति के लिए एक विज्ञान' नामक सम्मेलन 4 से 5 दिसंबर 2011 के बीच आयोजित किया गया। यह संयुक्त रूप से लिस्बन, पुर्तगाल के योग संघ, आर्ट ऑफ़ लिविंग फाउंडेशन और SVYASA योग विश्वविद्यालय, बेंगलूर के द्वारा आयोजित किया गया। जगत गुरु अम्रत सूर्यनंद के अनुसार विश्व योग दिवस का विचार वैसे तो 10 साल पहले आया था लेकिन, यह पहली बार था जब भारत की ओर से योग गुरु इतनी बड़ी संख्या में इस विचार को समर्थन दे रहे थे।[4][5][6] उस दिन श्री श्री रवि शंकर के नेतृत्व में विश्व योग दिवस के रूप में 21 जून को संयुक्त राष्ट्र और यूनेस्को द्वारा घोषित करने के लिए हस्ताक्षर किए गए।[7][8]
निम्नलिखित सदस्य उस सम्मेलन में उपस्थित थे: श्री श्री रवि शंकर, संस्थापक, आर्ट ऑफ़ लिविंग; अदि चुन चुन गिरि मठ के श्री स्वामी बाला गंगाधरनाथ; स्वामी पर्मात्मानंद, हिंदू धर्म आचार्य सभा के महासचिव; बीकेएस अयंगर, राममणि आयंगर मेमोरियल योग संस्थान, पुणे; स्वामी रामदेव, पतंजलि योगपीठ, हरिद्वार; डॉ नागेन्द्र, विवेकानंद योग विश्वविद्यालय, बंगलुरू; जगत गुरु अम्रत सूर्यानंद महा राज, पुर्तगाली योग परिसंघ के अध्यक्ष; अवधूत गुरु दिलीपजी महाराज, विश्व योग समुदाय, सुबोध तिवारी, कैवल्यधाम योग संस्थान के अध्यक्ष; डा डी.आर कार्तिकेयन, कानून-मानव जिम्मेदारियों व कारपोरेट मामलों के सलाहकार और डॉ रमेश बिजलानी, श्री अरबिंदो आश्रम, नई दिल्ली।

संयुक्त राष्ट्र की घोषणासंपादित करें


योग शिक्षक भारत में प्रशिक्षण (ट्रेनिंग) करते हुए
इस पहल को कई वैश्विक नेताओं से समर्थन मिला। सबसे पहले, नेपाल के प्रधानमंत्री सुशील कोइराला ने प्रधानमंत्री मोदी के प्रस्ताव का समर्थन किया।[9][10] संयुक्त राज्य अमेरिका सहित 177 से अधिक देशों, कनाडाचीन और मिस्र अदि ने इसका समर्थन किया है।[11][12] "अभी तक हुए किसी भी संयुक्त राष्ट्र महासभा के संकल्प के लिए यह सह प्रायोजकों की सबसे अधिक संख्या है।"[13][14] 11 दिसंबर 2014 को 193 सदस्यीय संयुक्त राष्ट्र महासभा ने सर्वसम्मति से 'योग के अंतर्राष्ट्रीय दिवस' के रूप में 21 जून को मंजूरी दे दी गयी।
संयुक्त राष्ट्र के घोषणा करने के बाद, श्री श्री रविशंकर ने नरेंद्र मोदी के प्रयासों की सराहना करते है कहा:
"किसी भी दर्शन, धर्म या संस्कृति के लिए राज्य के संरक्षण के बिना जीवित रहना बहुत मुश्किल है। योग लगभग एक अनाथ की तरह अब तक अस्तित्व में था। अब संयुक्त राष्ट्र द्वारा आधिकारिक मान्यता योग के लाभ को विश्वभर में फैलाएगी।"
योग के महत्व पर बल देते हुए श्री श्री रवि शंकर ने कहा कि योग आप को फिर से एक बच्चे की तरह बना देता है, जहाँ योग और वेदांत है वहां, कोई कमी, अशुद्धता, अज्ञानता और अन्याय नहीं है। हमें हर किसी के दरवाजे तक योग को ले जा कर दुनिया को दुखों से मुक्त कराने की आवश्यकता है।

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 2015संपादित करें


आईएनएस जलाश्व पर योग करते भारतीय नौसेना के जवान, 2015

तैयारियांसंपादित करें

भारत में पहले अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस को मनाने के लिए भाजपा के साथ बाबा रामदेव ने भी इस आयोजन के लिए खास तैयारियां की थी, विश्व योग दिवस को यादगार बनाने और पूरे विश्व को योग के प्रति जागरूक करने के लिए रामदेव ने 35 मिनट का विशेष पैकेज तैयार किया था। [16][17] 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के सफल होने के साथ ही भारत ने दो विश्व रिकार्ड भी कायम कर लिए हैं। [18]
भारत में 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस बड़े पैमाने पर मनाया गया जिसकी तैयारियां बड़े जोर-शोर से सरकार कर रही थी।[19] [20] योग दिवस का मुख्य समारोह दिल्ली के राजपथ पर हुआ जिसमें खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी शिरकत की।[21] प्रधानमंत्री राजपथ पर लगभग 36000 लोगों के साथ योग किया।[22] अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के मौके पर राजपथ के मंच को साझा करने के लिए प्रधानमंत्री के साथ कुल छह अन्य लोगों को मौका मिला प्रधानमंत्री कार्यालय ने चार योग गुरु जिसमें योग गुरु बाबा रामदेवसव्यासा के प्रमुख एच आर नागेंद्रश्रीमती हंसाजी जयदेव योगेंद्र और स्वामी आत्माप्रियनंदा को शामिल किया गया साथ ही आयुष मंत्री श्रीपद नाइक और आयुष मंत्रालय सचिव निलंजन सान्याल के मंच पर बैठने को मंजूरी मिली थी।[23] अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस समारोह का गणतंत्र दिवस समारोह जैसा कवरेज दूरदर्शन द्वारा किया गया। इसका सीधा प्रसारण किया गया, प्रसारण अंतरराष्ट्रीय मानक का हो यह सुनिश्चित करने के लिए अत्याधुनिक उपकरण का इस्तेमाल किया गया।[24]प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के साथ राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल को भी योग दिवस के लिए निमंत्रण भेजा था।[25] राजनैतिक लोगों के अलावा योग गुरु बाबा रामदेव और बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन को भी न्योता भेजा गया।[26] संयुक्त राष्ट्र में भी योग दिवस मनाने के लिए व्यापक तैयारी की गयीं।[27] पहले अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के उपलक्ष्य में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने संयुक्त राष्ट्र में आयोजित समारोह की अध्यक्षता की। टाइम्स स्क्वायर से वैश्विक दर्शकों के लिए इसका प्रसारण हुआ।[28] [29]

समारोहसंपादित करें


भारत के चिनावल गाँव में एक स्कूल में योग दिवस समारोह
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गणमान्य लोगों सहित करीब 36000 लोगों ने , 21 जून 2015 को नई दिल्ली में पहले अंतर्राष्ट्रीय दिवस के लिए 35 मिनट तक 21 योग आसन (योग मुद्राओं) का प्रदर्शन किया। योग दिवस दुनिया भर में लाखों लोगों द्वारा मनाया गया।[30]
राजपथ पर हुए समारोह ने दो गिनीज रिकॉर्ड्स की स्थापना की: सबसे बड़ी योग क्लास 35,985 लोगों के साथ और चौरासी देशों के लोगों द्वारा इस आयोजन में एक साथ भाग लेने का रिकॉर्ड भी अपने नाम किया। इस रिकॉर्ड को आयुष मंत्री श्रीपद नाइक ने स्वयं ग्रहण किया। 


अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 2016संपादित करें

भारत में, आयुष मंत्रालय ने सभी सरकारी विभागों को एक पात्र जारी करते हुए कहा कि "भारत सरकार ने इस वर्ष के समारोह के दौरान युवाओं की अधिक से अधिक और सक्रिय भागीदारी के साथ योग के अंतर्राष्ट्रीय दिवस, 2015 के द्वारा बनाई गई गति को आगे ले जाने का फैसला किया है। " [33]मंत्रालय "द नेशन इवेंट ऑफ़ मास योगा डेमोंस्ट्रेशन" नामक एक समारोह का अयोजन, चंडीगढ़ में करेगा जिसमें भारत के प्रधानमंत्री द्वारा भाग लिया जाएगा।[34]
भारत का स्थायी मिशन संयुक्त राष्ट्र के लिए 20 जून और 21 को संयुक्त राष्ट्र में समारोह का आयोजन करेगा जिसमें "कन्वर्सेशन विद योगा मास्टर्स - योगा फॉर द अचीवमेंट ऑफ़ सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स (एसडीजी)" मुख्य बिंदु होगा। [35] सदगुरु घटना में मुख्य वक्ता होंगे।
योग दिवस के कार्यक्रम का नेतृत्व करने की ज़िम्मेदारी 57 मंत्रियों को दी गई है, उनमें गृहमंत्री राजनाथ सिंहवित्त मंत्रीअरुण जेटलीरक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर और स्मृति इरानी शामिल हैं। विशेष यह है कि अरुण जेटली, मुख्तार अब्बास नकवीनिर्मला सीतारमन और मेनका गांधी समेत 10 मंत्रियों को उत्तर प्रदेश में होने वाले आयोजनों में शामिल होने को कहा गया है।[36]
अमेरिकी राजधानी के कैपिटल हिल से लेकर न्यूयार्क के संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय तक देश के कई शहरों में योग कार्यक्रमों के आयोजन की योजना है।[37]

विवादसंपादित करें

इस दिवस का विवादों में अपना हिस्सा था। सरकार ने 'अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस' के दौरान विवाद से बचने के लिए "सूर्य नमस्कार" व "श्लोक" जप की अनिवार्यता को आधिकारिक योग कार्यक्रम से हटा दिया और मुसलमानों से इस आयोजन में भाग लेने की अपील की। आयुष मंत्री श्रीपद नाइक ने मुसलमानों से इस कार्यक्रम के दौरान श्लोक के स्थान पर अल्लाह के नाम को पढ़ लेने का सुझाव दिया।[38]
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सूर्य नमस्कार को धर्म के खिलाफ बताते हुए इसका विरोध किया।[38]
मुस्लिम अल्पसंख्यक आम तौर पर "हिंदू एजेंडा" के बारे में चिंतित थे।


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